Tuesday, 9 April 2019

Web portal क्या है? पोर्टल और वेबसाइट में क्या अंतर है?

what is web portal in Hindi

आपने कहीं न कहीं वेब पोर्टल का नाम जरुर सुना होगा। कई बार वेबसाइट और पोर्टल दोनों को एक ही समझा जाता है। लेकिन क्या इन दोनों में कोई अंतर नही है? आखिर वेब पोर्टल क्या होता है? इसका क्या काम है? इन सभी सवालों के जवाब आपको इस आर्टिकल में मिलेंगे।
वेब पोर्टल क्या है? What is Web Portal in Hindi? दरअसल यह एक प्रकार का वेबसाइट ही है जहाँ अलग-अलग sources से कई सारे सूचनाओं को एकत्रित कर एक single platform पर उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन इसे access करने के लिए यूजर को लॉग इन करना पड़ता है जिसके लिए username और password की जरुरत पड़ती है।

यह एक प्रकार का विशेष रूप से डिजाईन किया गया वेबसाइट होता है जो किसी विशेष काम के लिए उपयोग होता है। आजकल लगभग हर बिज़नस या आर्गेनाइजेशन में पोर्टल की जरुरत होती है जिसमे वहां के employee को एक ही स्थान पर सारी जानकारियाँ मिल जातीं हैं।

उदाहरण के लिए किसी हॉस्पिटल के लिए एक patient portal बनाया जा सकता है। जिसपर वहां के डॉक्टर्स लॉग इन करके उस हॉस्पिटल के सारे मरीजों की जानकारी एक ही स्थान पर देख सकते हैं। यह एक प्रकार का प्राइवेट पोर्टल होगा जो सिर्फ उस हॉस्पिटल के स्टाफ के लिये उपयोगी होगा।

इसके अलावा कई सारे पब्लिक पोर्टल्स भी होते हैं जहाँ पर कोई भी अपना account बना कर पोर्टल की सुविधाओं का लाभ उठा सकता है।

ज्यादातर पोर्टल्स किसी विशेष category पर बनाये जाते हैं और user को personalized information दिया जाता है यानी यूजर को उनके जरुरत के अनुसार अलग-अलग तरह की जानकारियाँ दी जातीं हैं।

जैसे job portal, जहाँ सिर्फ नौकरी और रोजगार जैसी सूचनाएं यूजर तक पहुंचाई जाती हैं। लेकिन हर नौकरी की सूचना हर यूजर को नही भेजी जाती यह निर्भर करता है यूजर की योग्यता पर।

जब naukri. com जैसे जॉब पोर्टल पर आप register करते हैं तो वहाँ आप अपना resume डाल सकते हैं और अपनी शिक्षा, अनुभव और योग्यता की जानकारी दे सकते हैं। इसके बाद आपके द्वारा दी गयी इन सारी जानकारियों के अनुसार आपके योग्य नौकरी की सूचनाएं आपको दी जाती हैं।

इन वेब पोर्टल्स को डेस्कटॉप, मोबाइल फ़ोन जैसे किसी भी डिवाइस के द्वारा इन्टरनेट के जरिये कहीं से भी  access किया जा सकता है।

पोर्टल कितने प्रकार के होते हैं? Types of Web Portals in Hindi वैसे तो वेब पोर्टल के कई प्रकार के होते हैं लेकिन उनमे से मुख्य प्रकारों के नाम नीचे दिए गये हैं:
  • Vertical Portals: इस प्रकार के पोर्टल में किसी एक विषय, इंडस्ट्री, या क्षेत्र के बारे में जानकारी होती है। उदाहरण के लिए यदि कोई बिज़नस पोर्टल है तो उसमे केवल बिज़नस के बारे में ही जानकारियाँ होंगी।
  • Horizontal Portals: इसे "मेगा पोर्टल" भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ कई सारे topics के बारे में contents उपलब्ध होते हैं। 
  • Enterprise Portals: यह privat portal होता है जो किसी organization के कर्मचारियों के लिए बनाया जाता है। इसपर employee की सुविधा और सहायता के लिए तरह-तरह के information और services provide किये जाते हैं। 
  • Knowledge Portals: इस पोर्टल का उद्देश्य होता है की जानकारियों को सही और आसान तरीके यूजर तक पहुँचाया जाय। 
  • Market Place Portals: इसका उपयोग business to business (B2B), business to customer (B2C) के support के लिए किया जाता है। जैसे ecommerce की site जहाँ customer आसानी से products ढूंढ पाता है, इसे मार्केटप्लेस पोर्टल कहा जा सकता है।
वेब पोर्टल की विशेषताएं (Features of Web Portal)
  • लॉग इन करना जरुरी होता है: पोर्टल में दी गयी सुविधाओं को पाने के लिए यूजर को login करना पड़ता है।
  • पोर्टल के मेम्बेर्स ही access कर सकते हैं: यदि आप registered member नही हैं तो आप इसपर नही कर पायेंगे।
  • Personalized Information: हर यूजर सारी जानकारियों को देख नही सकता उसको उसके role और permission के अनुसार ही जानकारियां दिखाई जाती हैं।
  • Domain Specific: किसी एक category या एक विशेष क्षेत्र के लोगों के लिए हो सकता है।
  • Dynamic Contents: एक वेबसाइट के मुकाबले पोर्टल पर information लगातार बदलते रहते हैं क्योंकि अलग-अलग यूजर को उनके काम की ही जानकारी और services दी जाती हैं।
  • Communication: यह भी पोर्टल का एक feature होता है जिससे मेम्बर आपस में बात कर सकते हैं और एक दुसरे के संपर्क में रह सकते हैं।
वेब पोर्टल्स के कुछ उदहारण
Web portals के कई सारे examples हैं जिनमे से कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें हम हर रोज use करते हैं। ऐसे popular web portals के नाम नीचे दिए गये हैं।
  • Google
  • Yahoo!
  • Facebook
  • YouTube
  • Twitter
  • Blogger
  • Amazon
  • Flipkart
  • PayTM
  • Naukri
  • Monster
  • OnlineSBI
  • UIDAI - Aadhar Card Portal
  • TimesOfIndia
  • 99acres
  • Yatra
ये सारे पोर्टल्स अपने users को personalized information provide करते हैं। जैसे यदि हम गूगल की बात करें तो user के country, area और personal settings के अनुसार search results दिखाता है।

पोर्टल और वेबसाइट में क्या अंतर है? Website Vs Web Portal in Hindi

वेबसाइट वेब पोर्टल्स
इसे कोई भी publicaly access कर सकता है। यह private होता है और इसे केवल registerd users ही access कर सकते हैं।
लॉग इन करने की जरुरत नही पडती। लॉग इन करना पड़ता है।
इसके content सभी के लिए एक सामना होते हैं। अलग-अलग यूजर के लिए अलग-अलग कंटेंट हो सकते हैं।
Website में communication की सुविधा नही होती। यहाँ पर two-way communication होता है। users पोर्टल पर बात कर सकते हैं।
वेबसाइट का उद्देश्य किसी कंपनी, प्रोडक्ट आदि के प्रचार के लिए किया जाता है इस लिए इस पर अधिक से अधिक traffic drive करने की कोशिश की जाती है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच सके। जबकि एक portal का काम users, clients, employees आदि को सुविधाएँ प्रदान करना होता है। यानी इसे विशेष ग्रुप के लोगों को ध्यान में रख कर बनाया जाता है।
आगे पढ़ें:

हमें उम्मीद है की यह आर्टिकल पढ़ कर आपको समझ आ गया होगा की web portal क्या होता है और website और portal में क्या differences हैं

इस बारे में आप अपना सवाल या सुझाव नीचे comment करके हमें जरुर बताएं।

Thursday, 14 March 2019

सर्च इंजन क्या है? कितने प्रकार के होते हैं? यह कैसे काम करता है?

What is search engine in Hindi

हम अपने मोबाइल से या कंप्यूटर से गूगल पर हर रोज कुछ न कुछ सर्च करते हैं। आज भी आपने कुछ न कुछ  जरुर सर्च किया होगा।

आज सर्च इंजन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा बन गयीं हैं। अब वो समय चला गया जब लोग सिर्फ पढाई करने के लिए गूगल पर जाते थे, आज लोग अपनी हर छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान सबसे पहले गूगल पर ढूंढते हैं।

आज किसी मूवी की रेटिंग देखनी हो, कोई रेसिपी बनाने की विधि देखनी हो, अपने आसपास होटल ढूँढना हो या हमें किसी भी चीज की जानकारी चाहिए हो तो हम सीधा गूगल पर टाइप कर देते हैं और सारी जानकारियाँ हमें मिल जाती हैं।

लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है की आखिर गूगल काम कैसे करता है? एक सर्च इंजन कैसे काम करता है?

इन्टरनेट पर अरबों की संख्या में जानकारियाँ भरी पड़ी हैं, लेकिन इन सब के बीच में से सिर्फ वही जानकारियाँ हमें दिखाई देती हैं जो हम खोज रहे होते हैं।

आखिर ये सब होता कैसे है?

इसे समझने के लिए आपको सर्च इंजन के काम करने का तरीका जानना होगा। और इसके लिए आप यह आर्टिकल शुरू से अंत तक जरुर पढ़ें।


सर्च इंजन क्या है? What is Search Engine in Hindi? Search engine एक प्रकार का प्रोग्राम है जो की वर्ल्ड वाइड वेब पर मौजूद जानकारियों को keywords के जरिये ढूँढने में users की मदद करता है।

जब भी यूजर कोई कीवर्ड या सवाल सर्च बॉक्स में enter करके submit बटन पर क्लिक करता है तो सर्च इंजन यह समझने की कोशिश करता है की यूजर क्या ढूंढना चाहता है, और वह उससे जुडी जानकारियों को खोजकर व्यवस्थित तरीके से Search Engine Result Page (SERP) पर दिखाता है।

एक वेब सर्च इंजन के पास automatic programs होते हैं जो की इन्टरनेट पर मौजूद websites और webpages पर जाकर लगातार जानकारियाँ इक्कठा करते रहते हैं।

उसके बाद उन web pages की जानकारियों को व्यवस्थित तरीके से अपने डेटाबेस में स्टोर रखता है ताकि जब जरुरत पड़े तो आसानी से ढूंढा जा सके।

अपने यूजर को सही और एकदम सटीक जानकारी देना किसी भी सर्च इंजन की पहली प्राथमिकता होती है।

सर्च इंजन कैसे काम करता है? How Search Engine Works in Hindi सर्च इंजन कई प्रकार के होते हैं और हर सर्च इंजन के काम करने का तरीका अलग-अलग होता है। हर search engine का अपना एक सीक्रेट mathematical formula होता है जिसे algorithm कहा जाता है।

यही algorithm तय करता है की सर्च करने पर कौनसी वेबसाइट सबसे पहले और बाद में आने वाली है यानि result page पर किसी वेबसाइट की रैंकिंग कितनी होगी यह अल्गोरिथम से ही तय होता है।

हालांकि गूगल, याहू जैसे सर्च इंजन द्वारा लोगों को अपनी वेबसाइट की रैंकिंग बढाने के लिए टिप्स तो दिए तो जाते हैं लेकिन उनके alogrithms के बारे में पूरी जानकारी नही दी जाती ताकि कोई उसका गलत तरीके से उपयोग न कर सके।

सर्च इंजन का मुख्य काम अलग-अलग web pages पर जाकर जानकारियों को खोजना, उन्हें organize करना और content की quality के अनुसार ranking करना होता है।

एक crawler-based search engine जैसे Google, Yahoo, Bing आदि को 3 steps follow करने होते हैं:
  1. Crawling
  2. Indexing 
  3. Ranking

Crawling:
यह सबसे पहला चरण होता है, इसमें कुछ automatic programs जिसे crawler, bot या spider कहा जाता है ये वर्ल्ड वाइड वेब पर घूम-घूम कर information collect करते रहते हैं।

ये क्रॉलर हर सेकंड में सैकड़ों website के pages को scan करता है यह पेज में उपलब्ध किसी भी लिंक के जरिये दुसरे पेज तक पहुँच जाता है और ऐसे ही यह लगातार पूरे इन्टरनेट पर घूमता रहता है। 

किसी भी वेबसाइट में घुसने पर ये crawler वहां उपलब्ध कई तरह की जानकारियों को एकत्रित करते हैं जैसे:
  • Page का title और description
  • पेज में कौन-कौन से keywords use किये गये हैं।
  • Images और videos हैं या नही।
  • Website में कितने pages हैं।
  • कौन कौन से links हैं।
  • Page को कब update किया गया है।
  • कौन-कौन से पेज को delete किया गया है आदि।
किसी पेज को दोबारा कब crawl किया जायेगा यह search engine के algorithm और rules द्वारा तय होता है।

Indexing:
Crawling केवल जानकारियों को collect करने का एक प्रोसेस था। अब इसके बाद बारी आती है indexing की।

इस step में crawl किये गये जानकारियों को सही क्रम में व्यवस्थित करके सर्च इंजन के डेटाबेस में store किया जाता है ताकि सर्च किये जाने पर जल्दी से इन information को process करके user को दिखाया जा सके।

इसे आप किसी किताब के index page से तुलना कर सकते हैं। जिस प्रकार यदि हमें किसी book के अंदर कोई specific topic ढूंढनी हो तो हम सबसे पहले index पर जा कर पता करते हैं की वह कौन से पेज पर है।

गूगल भी ठीक इसी तरह का एक इंडेक्स तैयार करता है जिसमे एक टेबल के फॉर्मेट में सभी web pages की जानकारी जैसे पेज का title, descripting, keywords, internal links, external links आदि को store करता है।

Ranking:
यह तीसरा और सबसे आखरी स्टेप है। इस स्टेप में यह decide होता है की कौन सी query या keyword search करने पर Search Engine Result Page (SERP) में कौन-कौन से और किस क्रम में pages दिखाई देंगे।

ये सारे काम search engine के ranking algorithm के द्वारा होता है जो की बहुत ही complex mathematical formula से बना होता है जिसे समझ पाना काफी कठिन है।

आखिर सर्च इंजन का ranking algorithm कैसे काम करता है? जैसा की मैंने ऊपर बताया की इसे समझना काफी मुश्किल काम है, मुश्किल इसलिए क्योंकि कोई भी सर्च इंजन अपने एल्गोरिथम के बारे में पूरी जानकारी नही देता और कई सारी चीजों को गोपनीय रखा जाता है।

Google अपने SERP में किसी वेबसाइट की रैंकिंग को निर्धारित करने के लिए 200 से भी अधिक rules का पालन करता है। लेकिन किसी को भी निश्चित तौर पर यह नही पता की वे rules क्या-क्या हैं। इसे हमेशा secret रखा जाता है।

किसी भी रैंकिंग एल्गोरिथम का मुख्य काम pages को उनकी quality content के अनुसार रैंक करना होता है। ताकि उपयोगकर्ताओं को सही और सटीक information provide किया जा सके।

सही तरीके से रैंकिंग करने के लिए गूगल को अपने algorithm को समय-समय पर update करना पड़ता है।

हर साल गूगल अपने एल्गोरिथम में 500 से 600 बार बदलाव करता है।

यही वजह है की यदि हम कुछ साल पहले की बात करें तो किसी के लिए भी अपनी वेबसाइट को रैंक कराना आसान काम होता था। लेकिन अब यह बहुत ही जटिल काम हो गया है।

अब कुछ भी सर्च करने पर सिर्फ वही websites top 10 पर आते हैं जिनके content में quality हो और जो users को सही जानकारी दे रहा हो।

खैर, चलिए वापस लौटते हैं अपने पॉइंट पर और एक मोटे तौर पर समझने की कोशिश करते हैं की search algorithm कैसे काम करता है।

गूगल के अनुसार search algorithm नीचे दिए गये कुछ steps को follow करता है:

1. सर्च किये गये शब्दों (query) को समझना: सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम होता है आपके द्वारा search bar में enter किये गये शब्दों को समझना।

शब्द कौन सी भाषा में है और उसका क्या अर्थ है, उसके और कौन-कौन से समानार्थी शब्द हो सकते हैं यह जानना जरुरी है ताकि सही परिणाम दिखाया जा सके।

कई बार user अपनी query में speling mistakes भी करता है जिसे समझना और ठीक करने का काम भी किया जाता है।

कई बार एक ही शब्द के कई सारे meanings होते हैं, ऐसी स्थिति में sentance को समझकर उससे सम्बन्धित रिजल्ट दिखाने का काम भी एल्गोरिथम द्वारा किया जाता है।

इसके अलावा कई सारे keywords ऐसे भी होते हैं जिनके search results कुछ अलग format में दिखाए जाते हैं जैसे यदि आप "restaurant near me" search करें तो आपको आपके आसपास में उपलब्ध रेस्टोरेंट की जानकारी उनकी rating और map के साथ दिखाई जाती है।

यदि आप "40+50" सर्च करें तो इसे समझ आ जाता है की यह गणित का सवाल है और इसका सर्च रिजल्ट कुछ ऐसा दिखाई देता है:
Search query में ऐसे keywords को पहचानने और उससे जुड़े data को विशेष format में दिखाने का काम भी इसी algorithm का ही होता है।

2. Index से मिलान करना: सर्च किये गये Keywords को समझने के बाद इसे index में store किये गये data से match किया जाता है और इससे जुड़े हुए pages को खोजा जाता है।

यहाँ ध्यान रखा जाता है की आप कौनसे भाषा में सर्च कर रहे हैं और उसी भाषा में लिखे गये pages को खोजा जाता है।

किसी पेज को select करते समय यह देखा जाता है की वह शब्द उस पेज में कितनी बार और कहाँ-कहाँ उपयोग किया गया है, देखा जाता है की ये keywords page के title में लिखा गया है या headline में या body में use किया गया है। इससे यह समझने में आसानी होती है की जो information user द्वारा serach किया जा रहा है उसके बारे में जानकारी उस page में यह या नही।

3. उपयोगी web pages की ranking करना: 
इन्टरनेट पर करोड़ों websites हैं ऐसे में यह बिलकुल सम्भव है की उस query से सम्बन्धित सैकड़ों webpages हों। इस स्थिति में webpages को उनकी quality के अनुसार rank किया जाता है और SERP में सबसे बेहतर पेज के URL को पहले दिखाया जाता है।

पेज की quality तय करने के लिए कई सारे factors ध्यान में रखे जाते हैं जैसे:
  • Search की गयी कीवर्ड पेज में कितनी बार repeat हो रही है।
  • पेज की जानकारी कितनी fresh है।
  • वेबसाइट की विश्वसनीयता कितनी है।
  • User experience (UX) का ध्यान रखा गया है या नही 
  • Site की speed सही है या नही आदि।
इन सबके अलावा और भी सैकड़ों factors होते हैं जिनका पेज रैंकिंग के समय ध्यान रखा जाता है।

4. Context का ध्यान रखना:
इस स्टेज में कुछ extra information जैसे आपकी location, country, area, past search history और search settings का ध्यान में रखकर data को इस प्रकार से filter किया जाता है की दिखाई देने वाला result आपके लिए उपयुक्त हो।

5. Result show करना
अब आखिर में रिजल्ट show किया जाता है जिसमे ध्यान रखा जाता है की यूजर के सवाल का जवाब सही तरह से दिखाया जाय इसमें सिर्फ text content ही नही बल्कि images, videos जो भी उस query के बारे में बेहतर हो उसे दिखाया जाता है।

सर्च इंजन कितने प्रकार के होते हैं? Types of Search Engine in Hindi सर्च इंजन मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं:
  1. Crawler-Based Search Engines
  2. Web Directories
  3. Hybrid Search Engines
  4. Meta Search Engines
Crawler-Based Search Engines:
इस प्रकार के सर्च इंजन में crawler या bot का उपयोग होता है crawling, indexing, और ranking जैसे steps follow किये जाते हैं जिनके बारे में हम पहले ही ऊपर बता चुके हैं।

इस तरह के सर्च इंजन के उदहारण हैं:
  • Google
  • Yahoo!
  • Bing
  • DuckDuckGo
  • Yandex
  • Ask

Web Directories:
यह एक प्रकार का डायरेक्टरी सिस्टम होता है जहाँ कई सारे websites की link और उनके बारे में जानकारी दी जाती है। इसमें websites को अलग-अलग categories के अनुसार list बना कर दिखाया जाता है।

इस डायरेक्टरी में अपनी वेबसाइट को register करने लिए website का owner अपनी साईट की category और short descripting लिखकर submit करता है।

यहाँ कोई automatic system नही होता, सबमिट किये गये साईट को editor द्वारा manually review किया जाता है और डायरेक्टरी के नियमो के अनुसार सही पाए जाने पर add कर लिया जाता है अथवा reject कर दिया जाता है।

इसपर एक search box होता है जिसके जरिये वेबसाइट को खोजा जा सकता है। सर्च किये गये शब्दों को directory में उपलब्ध sites के description से match किया जाता है और सर्च रिजल्ट के रूप में match होने वाले sites की लिस्ट दिखाई जाती है।

Web directories के कुछ उदाहरण:
  • A1WebDirectory
  • Blogarama
  • 9sites 
Hybrid Search Engines:
हाइब्रिड सर्च इंजन रिजल्ट दिखाने के लिए crawler और directories दोनों का उपयोग करते हैं। जैसे गूगल crawling method के अलावा डायरेक्ट्रीज से भी किसी वेबसाइट के बारे में जानकारियाँ जुटा सकते हैं।

पुराने समय में directories का बहुत उपयोग होता था, अगर आपकी साईट कई सारी web directories में listed है तो आप बड़ी आसानी से गूगल में रैंक कर सकते थे। क्योंकि उस समय Google वेब डायरेक्टरी को काफी प्राथमिकतायें देता था।

लेकिन अब धीरे-धीरे web directories की value कम होती जा रही है और hybrid सर्च इंजन crawler-based search engine बनते जा रहे हैं।

हाइब्रिड सर्च इंजन के उदाहरण हैं:
  • Google
  • Yahoo!
Meta Search Engines:
ऐसे सर्च इंजन जो किसी अन्य सर्च इंजन से data ला कर रिजल्ट दिखाते हैं, मेटा सर्च इंजन कहलाते हैं। जब यूजर कोई query enter करता है तो यह उस query को अलग-अलग कई सारे अन्य search engines पर ले जाकर सर्च करता है और सभी के results को ला कर उसपर खुद का algorithm apply करता है और उसे filter करके यूजर को दिखाता है।

मेटा सर्च इंजन के examples:
  • Dogpile
  • Metacrawler
कुछ अन्य प्रकार के search engines:
आपको इन्टरनेट पर कुछ ऐसे सर्च इंजन भी मिलेंगे जो की किसी विशेष category पर सर्च करने के लिए बनाये गये हैं। इनके कुछ examples नीचे दिए गये हैं:

Shopping के लिए:
  • Google Shopping 
  • Yahoo Shopping
  • PriceGrabber 
News खोजने के लिए:
  • Google News
  • Yahoo News
Image search engines:
  • Google Image
  • Bing Image
  • Yahoo! Image
Reverse Image Search Engines:
  • TinyEye
  • Pinterest
  • Google Reverse Image search
गाने और म्यूजिक खोजने के लिए:
  • Allmusic
  • Last FM
  • Sound Click
  • BeeMP3
इस तरह के कई प्रकार के सर्च इंजन हैं जिनका उपयोग आप अलग-अलग काम के लिए कर सकते हैं।

दुनिया के 10 सबसे बेस्ट सर्च इंजन कौन से हैं? Top 10 Best Search Engines
चलिए अब जानते हैं की इन्टरनेट पर मौजूद सबसे बेहतर search engines कौन-कौन से हैं। 10 सबसे बेस्ट सर्च इंजन के नाम उनकी लोकप्रियता आधार पर कुछ इस प्रकार हैं:

  1. Google
  2. Bing
  3. Baidu
  4. Yahoo!
  5. Yandex
  6. Ask
  7. AOL
  8. DuckDuckGo
  9. WolframAlpha
  10. Dogpile
इस लिस्ट में सबसे ऊपर गूगल है जो दुनिया no. 1 सर्च इंजन है। Netmarketshare के report (फरवरी 2019) के अनुसार पूरे वर्ल्ड में 70% searches गूगल पर हुए हैं। 

इस पोस्ट में हमने आपको बताया की सर्च इंजन क्या है? यह कैसे काम करता है? और कितने प्रकार के होते हैं।हमें उम्मीद है आपको सर्च इंजन के बारे में ये जानकारियाँ पसंद आई होंगी। इस बारे में आप अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरुर शेयर करें। धन्यवाद!

Friday, 1 March 2019

वेबसाइट और ब्लॉग में क्या अंतर है? आपको क्या बनाना चाहिए? Website Vs Blog in Hindi

website-vs-blog-in-hindi
इससे पहले हमने ब्लॉग और वेबसाइट को समझाने के लिए दो अलग-अलग articles लिखे थे, एक में हमने बताया था की वेबसाइट क्या होता है? और दूसरे में हमने लिखा था की ब्लॉग क्या होता है और लोग ब्लॉगिंग क्यों करते हैं?

हमने बताया था की blog एक तरह का website ही है, लेकिन यहाँ पर confusion यह है की यदि ब्लॉग website है तो ब्लॉग और वेबसाइट में क्या अंतर है?

दरअसल ब्लॉग और वेबसाइट में कुछ समानताएं भी हैं जैसे:
  • दोनों के लिए domain और hosting की जरूरत पड़ती है।
  • इन दोनों को access करने के लिए web address यानि URL की जरूरत होती है।
  • दोनों में text, image, videos और graphics और links का उपयोग होता है।
कुछ लोग खुद की वेबसाइट या ब्लॉग शुरू करना चाहते हैं लेकिन वे इस दुविधा में फंस गए हैं की आखिर इन दोनों में से बेहतर क्या है? और उन्हें समझ में नही आ रहा की उन्हें website बनाना चाहिए या ब्लॉग?

ऐसे सवाल कई लोगों के मन में आते हैं इसलिए आज हमने इस आर्टिकल के माध्यम से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है।

यदि आप भी blog और website के बीच difference को समझना चाहते हैं तो इस आर्टिकल को जरुर पढ़ें।

इसे समझने के लिए यहाँ आज हम नीचे दिए गये कुछ बातों पर चर्चा करेंगे:
  • वेबसाइट और ब्लॉग में क्या अंतर है?
  • वेबसाइट बनाएं या ब्लॉग? दोनों में बेहतर कौन है?
  • क्या हम वेबसाइट और ब्लॉग दोनों बना सकते हैं?
तो चलिए अब हम इन सवालों के जवाब विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं। इनके अलावा यदि आपके मन में भी इस विषय से सम्बंधित कुछ सवाल है तो नीचे कमेंट करके हमें जरुर बताएं।

वेबसाइट और ब्लॉग में क्या अंतर है? Website Vs Blog in Hindi

अगर संक्षेप में कहें तो "सारे blogs वेबसाइट हैं लेकिन सभी websites ब्लॉग नही हो सकते"  यानि ब्लॉग को भी वेबसाइट कहा जा सकता है।

अभी भी confused हैं?

चलिए इसे और विस्तार से समझते हैं और सबसे पहले तो जान लेते हैं की आखिर वेबसाइट और ब्लॉग होते क्या हैं और इनकी पहचान क्या है।

Website क्या है?
एक website या site कई सारे related web pages का एक collection होता है। यानि की एक वेबसाइट कई सारे पेज से मिलकर बना होता है और इन pages को हम वेबसाइट के home page से access कर सकते हैं।

यदि आप कोई बिज़नस या आर्गेनाइजेशन चलाते हैं तो आपके पास एक वेबसाइट जरूर होना चाहिए। आजकल लगभग हर संस्था के लिए वेबसाइट जरुरी है। इसपर आप अपने कामकाज के बारे में और अपने बारे में लोगों को बता कर अपने प्रोडक्ट या सेवाओं के प्रति उनका भरोसा जीत सकते हैं।

वेबसाइट बनाने का सबसे बड़ा goal brand build करना होता है इससे आपके बिज़नस की पहचान बढती है और कस्टमर का आपके प्रति भरोसा बढ़ता है।

वेबसाइट के examples:
  • E-commerce sites: जैसे फ्लिप्कार्ट, अमेज़न, e-bay आदि।
  • Social networking sites: Facebook, Twitter, Instagram आदि।
  • Forums: Quora, Google forum, Stackoverflow आदि।
एक वेबसाइट की क्या पहचान है?
  • Website दिखने में professional होता है और यह किसी organization की पहचान बताता है। जैसे: Amazon, Microsoft, Google आदि।
  • वेबसाइट किसी संस्था, स्कूल, यूनिवर्सिटी आदि द्वारा अपने काम और पते के बारे में जानकारी देने के लिए भी बनायीं जाती है।
  • इसमें किसी प्रोडक्ट या सर्विस की जानकारी हो सकती है। और उसे ऑनलाइन खरीदने की सुविधा भी हो सकती है। उदाहरण के लिए: Flipkart, PayTM आदि।
  • इसमें registration form हो सकता है।
  • यूजर Login या register कर अपना अकाउंट बना सकते हैं।
  • कई बार यूजर को वेबसाइट के content को access करने के लिए login करना जरुरी होता है।
  • ज्यादातर websites में one-way communication होता है यानि वेबसाइट की तरफ से information दी जाती हैं लेकिन user उस साईट पर अपनी बात नही रख पाता। यानि comment करने की सुविधा नही होती।
  • लेकिन इसपर एक contact form हो सकता है जिससे visitors आपको messages भेज सके।
ब्लॉग क्या है?
ब्लॉग वेबसाइट का ही एक प्रकार है। यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जहाँ ब्लॉगर समय-समय पर लेख लिखकर लोगों तक विभिन्न विषयों के बारे में जानकारियाँ और अपने विचार साझा करता है।

ब्लॉग टेक्नोलॉजी, न्यूज़, राजनीती, शिक्षा जैसे किसी भी विषय पर लिखा जा सकता है यह पूरी तरह से ब्लॉग लिखने वाले के intrest पर निर्भर करता है। 

इसे किसी एक व्यक्ति या एक समूह द्वारा चलाया जा सकता है। आजकल कंपनियां अपने प्रोडक्ट या सर्विस के प्रचार के लिए ब्लॉग पर आर्टिकल लिख कर अपनी सेवाओं के बारे में बताती हैं और लोगों को आकर्षित कर कस्टमर बनाने की कोशिश करती हैं।

ब्लॉग बनाने का उद्देश्य लोगों तक अपना opinion पहुँचाना, काम की जानकारी देना, अपने customers से बात करना उन्हें engage रखना और उन्हें भी अपनी बात रखने का मौका देना और उन्हें समझना होता है।

एक ब्लॉग की क्या पहचान है?
  • Blog पर articles लिखे जाते हैं जिन्हें ब्लॉग पोस्ट कहा जाता है।
  • ब्लॉग पोस्ट को chronologial यानि date के अनुसार एक लिस्ट में दिखाया जाता है (सबसे नया पोस्ट पहले दिखाई देता है)
  • ब्लॉग के कंटेंट अपडेट होते रहते हैं और ब्लॉगर द्वारा समय-समय पर नए पोस्ट डाले जाते हैं।
  • हर पोस्ट के नीचे एक comment system होता है जहाँ विजिटर अपने comments share कर सकता है।
  • ज्यादातर कंटेंट informative और एजुकेशनल होते हैं।
  • कंटेंट को अगल-अलग categories में बाँटा जाता है।
  • इस पर एक subscription system भी होता है जिसे subscribe करने पर यूजर को नए post publish होने पर ईमेल द्वारा जानकारी दी जाती है। 
  • ब्लॉग किसी वेबसाइट का एक हिस्सा भी हो सकता है।

वेबसाइट बनाएं या ब्लॉग? दोनों में बेहतर कौन है?

इस सवाल का जवाब देना काफी मुश्किल है। क्योंकि इन दोनों के काम करने का तरीका अलग-अलग है, और इनका उपयोग भी अलग-अलग उद्देश्य के लिए किया जाता है।

आपको ब्लॉग बनाना चाहिए या वेबसाइट इस बात का निर्णय तो आपको ही लेना है लेकिन सही decision लेने में नीचे दी गयीं कुछ बातें आपकी मदद कर सकतीं हैं:
  • अगर आपको लिखना पसंद है और किसी विषय पर लगातार नई-नई जानकारियां लिख सकते हैं तो आपको ब्लॉग शुरू करना चाहिए।
  • वेबसाइट evergreen contents के लिए बेहतर है क्योंकि इसे ज्यादा update करने की जरुरत नही पडती और हमेशा नये articles लिखते रहने का दबाव भी नही होता।
  • किसी ब्लॉग को website के मुकाबले ज्यादा आसानी से update किया जा सकता है।
  • आप यदि ऑनलाइन प्रोडक्ट बेचना चाहते हैं तो आपको e-commerce की वेबसाइट बनानी चाहिए।
  • यदि आप किसी क्षेत्र में expert हैं और आप अपना अनुभव लोगों तक साझा करना चाहते हैं तो आपके लिए ब्लोगिंग बेहतर है।
  • यदि आपका कोई बिज़नस या आप कोई कंपनी चलते हैं और इन्टरनेट पर सिर्फ औपचारिक जानकारी जैसे आपकी क्या-क्या services हैं, आपके office का address क्या है, पिछले projects के portfolio आदि के बारे बताना चाहते हैं तो आपके लिए वेबसाइट बेहतर होगा।
  • आप कोई proffesional व्यक्ति हैं और अपने काम के बारे में लोगों को बताना चाहते हैं या online resume बनाना चाहते हैं तो आप एक वेबसाइट बनायें और अपना portfolio उस पर डालें, यह आपको नई नौकरी या प्रोजेक्ट पाने में आपकी सहायता कर सकता है।

क्या हम वेबसाइट और ब्लॉग दोनों बना सकते हैं?

हाँ! बिलकुल आप ऐसा कर सकते हैं। उदहारण के लिए आप मोबाइल बेचने और रिपेयर करने का बिज़नस करते हैं तो आप एक वेबसाइट बना कर उसपर अपना professional logo लगा कर और अपने service के बारे में बता कर अपने business की branding कर सकते हैं।

इसके अलावा आप साथ में एक ब्लॉग भी बना सकते हैं जिसपर आप मोबाइल के बारे में लोगों को बता सकते हैं, मोबाइल के reviews, tutorials, tips आदि डाल सकते हैं।

आप smartphone में आने वाली छोटी-छोटी समस्याओं का समाधान बता सकते हैं। इससे आपको फायदा यह होगा की लोग आपके बारे में जानने लगेंगे और इससे एक प्रकार का relationship build होगा और लोग आप पर trust करने लगेंगे। और अगली बार कोई फ़ोन से जुडी कुछ समस्या आने पर वे आपसे संपर्क करेंगे, इस तरह आप नये customers भी बना सकते हैं।


हमें उम्मीद है इसे पढ़ें के बाद आपको समझ आ गया होगा की वेबसाइट और ब्लॉग के बीच क्या अंतर है और आपको अपने online presence के लिए इनमे से किसका चुनाव करना चाहिए।

इसके बावजूद भी यदि को समस्या हो तो हमें जरूर बताएं, यदि इससे जुड़े कुछ सुझाव देना चाहते हैं तो भी आप नीचे कमेंट करके हम तक अपनी बात पहुँचा सकते हैं।

Wednesday, 16 January 2019

Scripting Language क्या है? स्क्रिप्टिंग और प्रोग्रामिंग में क्या अंतर है?

Scripting language kya hai?

आप PHP के बारे में तो जानते ही होंगे।

क्या आपको पता है की PHP एक scripting language है?

हो सकता है आपको पता हो, अगर आप इन्टरनेट पर PHP का definition देखें तो उसमे लिखा होता है की यह एक स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज है।

लेकिन कई बार लोगों को यह नही पता होता की scripting language क्या है?

फिर लोग इस बात को लेकर भी confuse रहते हैं की आखिर scripting और programing language में क्या अंतर है?

लेकिन यदि आप प्रोग्रामर, वेब डेवलपर या वेब डिज़ाइनर बनना चाहते हैं तो आपको इसके बारे में जानकारी जरुर होनी चाहिए, और इसके लिए आपको यह आर्टिकल जरुर पढना चाहिए।

स्क्रिप्टिंग क्या है? Script एक प्रकार का प्रोग्राम होता है जिसमे कई सारे प्रोग्रामिंग instructions यानि codes लिखे होते हैं जो की runtime पर interpret होते हैं।

Runtime पर interpret होने का मतलब यह है की जब कोई application running में हो या चल रहा हो तब कोड को read करके execute किया जाता है।

इसे आसानी से समझने के लिए हम फेसबुक का उदाहरण लेते हैं, आप जब किसी पोस्ट को लाइक करते हैं तब क्या होता है? क्या like बटन पर क्लिक करने से पेज refresh होता है?

नही, पेज रिफ्रेश नही होता, लेकिन फिर भी हमारा काम हो जाता है। ऐसा क्यों?

क्योंकि वहां पर runtime में एक स्क्रिप्ट execute होता है और वह बिना किसी रूकावट के हमारा काम कर देता है।

ऐसे स्क्रिप्ट को बनाने के लिए scripting language का उपयोग किया जाता है जो की एक प्रकार का प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है।

Scripting language की एक खासियत यह है की यह किसी अन्य language के साथ communicate कर सकती है।

इन scripts को HTML जैसे लैंग्वेज के साथ embed किया जा सकता है यानि HTML document में आप scripting के codes भी लिख सकते हैं।

Webpage में कई प्रकार के events perform होते हैं जैसे button click, key press करना, किसी element जैसे image, paragraph, heading आदि पर mouse hover करना। इन events का response क्या होगा यह हम scripting के जरिये define कर सकते हैं।

इसके जरिये आप अपनी वेब पेज पर कुछ extra features जैसे drop-down menu, image slider, animation effects आदि भी जोड़ सकते हैं।

Scripting का उपयोग सिर्फ वेबपेज में ही नही बल्कि operating systems में भी होता है। जहाँ यह किसी task को automate करने के लिए use किया जाता है।

स्क्रिप्टिंग और प्रोग्रामिंग में क्या अंतर है? लगभग सारे स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज प्रोग्रामिंग लैंग्वेज होते हैं।

अब आपके दिमाग में यह सवाल जरुर आ रहा होगा की आखिर scripting language और programming language में क्या difference है?

तो चलिए नीचे टेबल के माध्यम से जानते हैं की आखिर इनके बीच क्या अंतर है।

Programming language Scripting language
प्रोग्रामिंग में कोड execute होने से पहले compile होता है। स्क्रिप्टिंग में कोड compile करने की जरुरत नही है। यह runtime में interpret होता है।
किसी अन्य लैंग्वेज के साथ इसे embed करने की जरुरत नही है। ज्यादातर इसे HTML जैसे लैंग्वेज के साथ embed किया जाता है।
एक बार compile होने के बाद प्रोग्राम के source code को नही देखा जा सकता। वेब ब्राउज़र पर हम स्क्रिप्ट के source code को देख सकते हैं।
compile होने पर यह binary file बनाता है जिसके लिए अतिरिक्त memory की जरुरत पड़ती है। इससे किसी प्रकार की बाइनरी फाइल नही बनती और न ही यह अतिरिक्त स्पेस लेता है।
इसके कोड complex होते हैं। पूरे प्रोग्राम के लिए कई सारे codes लिखने पड़ते हैं। इसमें कुछ लाइन के कोड से ही काम हो जाता है।
Complexity के कारण इसे सीखने में समय लगता है।यह बहुत आसान होता इसलिए सीखने में समय नही लगता।
C, C++, Java आदि प्रोग्रामिंग लैंग्वेज के कुछ उदाहरण हैं। PHP, ASP, JSP, Python, JavaScript आदि स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज के examples हैं।

Client-side scripting क्या है?

Client-side scripting in Hindi

क्लाइंट-साइड स्क्रिप्टिंग के जरिये ऐसे स्क्रिप्ट तैयार किये जाते हैं जो की क्लाइंट यानि यूजर के सिस्टम (वेब ब्राउज़र) में रन होते हैं।

इस प्रकार के अधिकतर scripts HTML documents के अंदर लिखे जाते हैं। इनका काम वेब पेज को interactive बनाना होता है।

आपने कभी न कभी किसी वेबसाइट पर फॉर्म जरुर भरा होगा, आपने देखा होगा की जब हम फॉर्म के किसी फील्ड को blank छोड़ देते हैं और submit बटन पर क्लिक करते हैं तो सबमिट होने से पहले ही एक error दिखाई देता है जो बताता है की हमने एक field को खाली छोड़ दिया है। इस प्रोसेस को form validation कहा जाता है।

Form validation में यूजर द्वारा डाले गये inputs को validate किया जाता है। इस तरह के काम को JavaScript के द्वारा किया जाता है जो की एक प्रकार का client-side scripting है।

एक बार स्क्रिप्ट लोड हो जाने के बाद इसे सर्वर से interect करने की जरुरत नही पड़ती।

Client-side scripting में उपयोग होने वाले languages के उदाहरण हैं:
Client-side scripting के फायदे भी हैं जैसे:
  • यह तुरंत execute होता है क्योंकि सर्वर पर नही बल्कि यूजर के ब्राउज़र पर रन होता है।
  • सर्वर लोड को कम करता है जिससे वेबसाइट की स्पीड बढ़ जाती है।
  • वेब पेज को और अधिक इंटरैक्टिव बनाता है।
इन सबके अलावा client-side scripting के कुछ disadvantages भी हैं जैसे:
  • यह secure नही होता क्योंकि इसके कोड को कोई भी देख सकता है।
  • अलग-अलग ब्राउज़र script को अलग-अलग तरीके से सपोर्ट करते हैं।
  • अगर यूजर का ब्राउज़र पुराना है तो यह ठीक तरीके से काम नही करेगा।
Server-side scripting क्या है?
server-side scripting in Hindi

सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग एक ऐसा तरीका है जिसके जरिये हम किसी प्रोग्राम को सर्वर में चला सकते हैं। दुसरे शब्दों में कहें तो ऐसे scripts जो की वेब सर्वर में execute होते हैं, सर्वर साइड स्क्रिप्ट कहलाते हैं।

ये scripts server में स्टोर रहते हैं और तब execute होते हैं जब client की ओर से किसी task को perform करने के लिए request भेजा जाता है।

उदहारण के लिए जब आप फेसबुक पर login करने के लिए username और password enter करके login button पर click करते हैं तो आपके द्वारा डाला गया यूजरनेम और पासवर्ड सर्वर को भेजा जाता है जहाँ कोई server side script होता है वह डेटाबेस access करके यह verify करता है की आपने सही data enter किया है या नही।

गलत जानकारी होने पर यह script आपके browser को एक error message वाला web page send कर देता है। वहीँ login successful होने पर आप Facebook के home page पर चले जाते हैं।

यहाँ सबसे important बात यह है की ये program या script server पर ही execute होते हैं और execution के बाद जो भी output होता है उसे HTML page के रूप में client को भेज दिया जाता है।

आपने समाचार या मौसम की जानकारी देने वाले website या web application जरुर देखे होंगे जिनपर लगातार changes होते रहते हैं, और ऐसा सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग की मदद से ही सम्भव हो पाता है।

Server-side script बनाने के लिए कई प्रकार के programming languages उपयोग होते हैं जिनमे से कुछ common languages इस प्रकार हैं:
  • PHP
  • Java
  • Server-side JavaScript
  • Python
  • Perl
  • Ruby
अब चलिए बात करते हैं server-side scripting के advantages के बारे में:
  • इससे हम database driven website या web application बना सकते हैं।
  • इसके द्वारा dynamic content और pages बनाये जा सकते हैं।
  • इसके code server पर ही होते हैं और client को नही दिखाई देते इसलिए यह secure होता है।
  • Website admin स्क्रिप्टिंग से बने CMS (Content Management System) के जरिये अपनी वेबसाइट को बार-बार coding किये बिना आसानी से manage कर सकता है।
  • यह browser dependent नही होता इसलिए browser version की चिंता नही रहती।
  • Social media, e-commerce, यहाँ तक की railway ticket, airline reservation जैसे बड़े-बड़े complex websites सर्वर-साइड स्क्रिप्ट की वजह से ही काम कर पाते हैं।
इन benefits के अलावा server-side scripting के disavantages भी हैं जैसे:
  • यह तभी काम कर सकता है जब हम सर्वर पर scripting software install करते हैं।
  • किसी dynamic website को बनाने के लिए database जरुरी होता है।
  • यदि hosting server की speed कम है तो इसकी execution speed कम हो जाती है।
  • यदि website बहुत बड़ी हो या उस पर traffic अधिक हो तो हमें powerful और बेहतर होस्टिंग की जरुरत पड़ती है।
  • सही तरह से कोडिंग नही करने या गलतियाँ करने से वेबसाइट के हैक होने का खतरा बना रहता है।

क्लाइंट-साइड और सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग में क्या अंतर है?
Client-Side Scripting  Server-Side Scripting
यह front-end technology है।  यह back-end technology है।
यह यूजर के browser पर run होता है। यह web server पर run होता है।
इसके source code को user देख सकता है। इसके code client तक नही पहुँचते इसलिए इसे यूजर नही देख सकता।
क्लाइंट-साइड स्क्रिप्ट web server पर stored डेटाबेस से connect नही हो सकता। इसके द्वारा server पर उपलब्ध database को access किया जा सकता है।
Server के file system से किसी फाइल को यह access नही कर पाता। सर्वर पर उबलब्ध फाइल सिस्टम को यह access कर सकता है।
सर्वर-साइड की तुलना में क्लाइंट-साइड स्क्रिप्टिंग का response fast होता है। क्लाइंट-साइड की तुलना में सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग का response slow होता है।।
Client-side scripting को यूजर द्वारा ब्राउज़र की setting से block किया जा सकता है जिससे यह यूजर के ब्राउज़र पर run नही होगा। इस प्रकार के स्क्रिप्ट को यूजर block नही कर सकता।

Scripting Language का क्या उपयोग है? अलग-अलग तरीके से कई सारे जगहों पर इसका उपयोग किया जाता है जैसे:

  • Website और web applications में क्लाइंट-साइड और सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग, Javascript, jQuery, PHP, ASP आदि का उपयोग किया जाता है।
  • System-administration में भी इसका उपयोग होता है जहाँ Perl, Python, Shell scripts आदि use किया जाता है।
  • किसी software के लिए plugins या extensions बनाने के लिए भी उपयोग होता है।
  • विडियो गेम्स बनाने के लिए भी उपयोग होता है।

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उम्मीद है आपको scripting के बारे में यह जानकारी पसंद आई होगी। आप अपना सवाल या सुझाव नीचे कमेंट के माध्यम से हम जरुर पहुंचाएं।

Friday, 28 December 2018

डेटाबेस क्या है? इसका उपयोग कहाँ-कहाँ होता है?

What is database in Hindi

डेटाबेस क्या है? इसका उपयोग कौन करता है? आखिर इसकी जरुरत क्यों पड़ती है? इसके क्या फायदे हैं?

अगर आपके मन में ये सारे  सवाल आ रहें हैं तो आपको यह आर्टिकल जरुर पढना चाहिए।

कोई छोटा सा बिज़नस हो, सरकारी संस्था हो या मल्टीनेशनल कंपनी, कोई वेबसाइट हो या वेब एप्लीकेशन यहाँ तक की आप आपने मोबाइल में जो गेम खेलते हैं या कोई ऑनलाइन विडियो देखते हैं हर जगह डेटा ही डेटा हैं।

क्या आपने कभी सोचा है की इतने सारे डाटा को आखिर कहाँ रखा जाता है और उसे कैसे मैनेज किया जाता है?

ये सभी संभव हो पता है database की मदद से। आज हम इस आर्टिकल में इसी के बारे में चर्चा करने वाले हैं।
Data क्या है? डेटाबेस को समझने से पहले यह जानना जरुरी है की डेटा क्या होता है। डेटा किसी भी information का एक छोटा सा हिस्सा होता है। यह किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान जुड़ा से हुआ कोई तथ्य (fact) हो सकता है।

जैसे: आपका नाम, आपकी उम्र, ऊंचाई, वजन, मोबाइल नंबर आदि आपसे जुड़े हुए कुछ डेटा हैं।

डेटा अलग-अलग कई प्रकार के फॉर्मेट में हो सकते हैं जैसे टेक्स्ट, नंबर, इमेज, फाइल आदि।

जब इन्हीं डेटा को किसी विशेष फॉर्म में प्रोसेस किया जाता है तो वह इनफार्मेशन बन जाता है।

डेटाबेस क्या है? डेटाबेस कई सारे डेटा का एक समूह होता है। इन डेटा को डेटाबेस में एक व्यवस्थित तरीके से स्टोर किया जाता है ताकी जरुरत पड़ने पर इन्हें आसानी से access किया जा सके।

आपने Microsoft Office Excel का उपयोग किया होगा जहाँ पर हम डाटा स्टोर करने के लिए एक टेबल का उपयोग करते हैं जिसे हम अलग-अलग कई सारे कॉलम में डिवाइड करते हैं ताकि हमारा काम आसान हो सके।

ठीक इसी तरह डेटाबेस में भी डेटा को एक table में स्टोर किया जाता है जिसमे कई सारे columns और rows होते हैं जिनकी वजह से उन्हें access करना आसान हो जाता है।

एक डेटाबेस के अंदर ऐसे कई सारे tables हो सकते हैं।

इन्टरनेट पर मौजूद ऐसे कई सारे dynamic websites हैं जो database का उपयोग करते हैं।

उदाहरण के लिए आप फेसबुक को ही ले लीजिये, जिसपर यूजर के बारे में कई सारे data जैसे उनका नाम, मोबाइल नंबर, profile pictures, friends, messages, posts, status आदि सभी details सर्वर में उपस्थित database में ही स्टोर रहते हैं।

ठीक इसी तरह ई-कॉमर्स वेबसाइट जैसे Flipkart, Amazon आदि की हम बात करें तो वहां पर भी इसका उपयोग होता है। कस्टमर की जानकारी, product detail से लेकर हर एक जानकारी डेटाबेस में ही stored रहते हैं।

डेटाबेस में Field, Record, और Table क्या होते हैं? किसी डेटाबेस के मुख्यतः तीन elements होते हैं:
  1. Field
  2. Record
  3. Table
Field: किसी डेटाबेस टेबल में Fields को columns में दर्शाया जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो आप टेबल के कॉलम को फील्ड कह सकते हैं।

Example के लिए आप नीचे दिया गया student table देखें जिसमे Sid, Name, Class, Subject और Marks नाम के 5 fields हैं:
database table field example

Record: किसी टेबल के rows को हम records कह सकते हैं। उदाहरण के लिए नीचे दिया गया टेबल देखें जहाँ 4 records दिए गये हैं।
database-record

Table: Fields और Records से मिलकर एक complete table बनता है। इस टेबल पर कई सारे अलग-अलग लेकिन एक दुसरे से सम्बंधित data enter किये जाते हैं।

database table example

डेटाबेस का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? इसके कई सारे examples हो सकते हैं और सभी के बारे में बता पाना काफी मुश्किल काम है। हम नीचे कुछ उदाहरण दे जहाँ पर डेटाबेस का उपयोग होता है:

ऑनलाइन विडियो स्ट्रीमिंग: चाहे आप Youtube पर विडियो देखते हों या Netflix पर अपनी मनपसंद वेब सीरीज देखते हों हर विडियो स्ट्रीमिंग साईट अपने डाटा को मैनेज करने के लिए डेटाबेस का उपयोग करता है जहाँ पर विडियो के details से लेकर देखने वाले users का भी जानकारी स्टोर होती है।

ऑनलाइन गेमिंग: क्या आपने PUBG गेम खेला है? अगर हाँ तो आपने देखा होगा की एक साथ कई millions user गेम खेल रहे होते हैं, क्या आपने सोचा है की इतने सारे users और उनके नाम से लेकर उनकी गेमिंग हिस्ट्री कैसे मैनेज की जाती होगी? जाहिर सी बात है यहाँ भी डेटाबेस का उपयोग हो रहा है और इसके बिना यह संभव नही है।
शेयर मार्केट: स्टॉक मार्केट में सैकड़ों कम्पनियाँ रजिस्टर्ड हैं और इनके शेयर हर सेकंड में ऊपर-नीचे होते रहते हैं। यहाँ हर दिन अरबों रूपए से भी ज्यादा के लेन-देन होते हैं। इन सबके हिसाब कहाँ रहते होंगे? यहाँ भी डेटाबेस के बिना काम नही चलने वाला।

आधार कार्ड: आपने भी आधार कार्ड बनवाया ही होगा इस दौरान आपका नाम, जन्म तिथि, माता-पिता का नाम, यहाँ तक की आपकी उँगलियों के निशान से लेकर आपके आँखों की रेटिना के निशान जैसे हर प्रकार की जानकारियां आपको देनी पड़ी होंगी। आपको क्या लगता है ये सारी जानकारियां कहाँ और कैसे रखी गयी होंगी। यहाँ भी डेटाबेस की जरुरत पडती है।

रेलवे रिजर्वेशन सिस्टम: टिकट बुकिंग से लेकर ट्रेन की लाइव स्टेटस की जानकारी किसी डेटाबेस में ही रखे जाते हैं।

फ्लाइट रिजर्वेशन: रेलवे की तरह यहाँ भी फ्लाइट की हर एक जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए DB की जरुरत पड़ती है।

बैंकिंग: हम रोजाना बैंकों के माध्यम से हजारों लेन-देन करते हैं और हम बिना बैंक जाए केवल एक मोबाइल एप्प से ऐसा कर सकते हैं। तो कैसे बैंकिंग इतनी आसान हो गई है कि हम घर बैठे पैसा भेज या प्राप्त कर सकते हैं। यह सब डेटाबेस की वजह से ही संभव है जो सभी बैंक लेनदेन का मैनेजमेंट करता है।

सोशल मीडिया: हम सभी फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस जैसे सोशल मीडिया वेबसाइट पर हैं ताकि हम अपने विचारों को साझा कर सकें और अपने दोस्तों के साथ जुड़ सकें। इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लाखों उपयोगकर्ताओं ने साइन अप किया है। लेकिन उपयोगकर्ताओं की सभी जानकारीयां कैसे संग्रहीत की जाती है और हम अन्य लोगों से कैसे जुड़ पाते हैं, हाँ यह भी database का ही कमाल है।

ऑनलाइन शौपिंग वेबसाइट: इसका उदहारण तो हमने ऊपर ही दे दिया है। आप किसी ई-कॉमर्स साईट से कुछ भी खरीदें उसकी जानकारी सालों-साल तक सुरक्षित रहती है जिसे आप अपनी शौपिंग हिस्ट्री में कभी भी देख सकते हैं।

कॉलेज/ यूनिवर्सिटीज: स्टूडेंट से लेकर कर्मचारियों की हर एक जानकारियाँ डेटाबेस में ही रखे जाते हैं क्योंकि यह आसान और सुरक्षित है।

लाइब्रेरी मैनेजमेंट सिस्टम:  मेम्बरशिप डिटेल, किसने कौन सी बुक पढ़ी, किताबों की जानकारियाँ जैसी हर एक डाटा महत्वपूर्ण है जिन्हें DB पर सुरक्षित रखा जाता है।

हॉस्पिटल मैनेजमेंट सिस्टम: हॉस्पिटल के डॉक्टर्स और अन्य स्टाफ से लेकर मरीज और उनकी बिमारियों से जुड़े डाटा भी कहीं न कहीं सहेज कर रखे जाते हैं।

टेलीकम्यूनिकेशन: कोई भी दूरसंचार कंपनी बिना डेटाबेस सिस्टम के अपने व्यवसाय के बारे में सोच भी नहीं सकता। इन कंपनियों को कॉल डिटेल और मासिक बिल जैसी हर एक जानकारियां अपने पास रखनी होतीं हैं।
इन सबके अलावा और भी कई सारे जगह हो सकते हैं जहाँ database का उपयोग होता है। यदि आपको पता है तो हमें कमेंट करके जरुर बताएं।

डेटाबेस के क्या फायदे हैं?
चलिए अब जानते हैं की डेटाबेस का उपयोग क्यों करना चाहिए और इसके क्या फायदे हो सकते हैं:
  • डेटाबेस के जरिये कम स्पेस में भी ज्यादा डेटा स्टोर किया जा सकता है।
  • किसी भी जानकारी को आसानी से access किया जा सकता है।
  • नये data को insert करना, पुराने डेटा को edit करना और delete करना आसान है।
  • data को filter करना आसान है।
  • डाटा को अलग-अलग प्रकार से sort किया जा सकता है।
  • एक ही डेटाबेस को कई सारे applications या users एक साथ access कर सकते हैं।
  • किसी डेटाबेस टेबल से डाटा को import या export करना बहुत आसान है।
  • पेपर फाइल्स की तुलना में अधिक security provide करता है।
  • Redundancy को कम करता है।
  • Program और data को एक दुसरे से अलग रखता है।
  • बैकअप और रिकवरी जैसी सुविधाएँ प्रदान करता है।
DBMS (Database Management System) क्या है?
आपने यह तो समझ लिया की डेटाबेस क्या होता है और इसके क्या-क्या फायदे हैं लेकिन एक डेटाबेस काम कैसे करता है यह समझने के लिए आपको DBMS के बारे में जानना होगा।  

आपके मन में यह सवाल जरुर आ रहा होगा की डेटाबेस में डेटा कैसे स्टोर किया जाता होगा, उसे edit, update या delete कैसे किया जाता होगा?

दरअसल इस काम के लिए हमें एक सॉफ्टवेर के जरुरत पड़ती है जिसके जरिये हम database create कर सकते हैं उसको access करके उस पर कई प्रकार के operations perform कर सकते हैं।

डेटाबेस को manage करने के लिए ऐसे कई सारे software/programs होते हैं और इन्हें ही database management systems (DBMS) कहा जाता है।

DBMS एक interface provide करता है जिसके जरिये हम कई सारे काम कर पाते हैं जैसे:
  • Database create करना 
  • Table create करना 
  • Table में data insert करना 
  • Data retrive करना यानि access करना 
  • पहले से stored डाटा को update करना
  • डेटा delete करना आदि
इन सबके अलावा DBMS का काम data को secure रखना भी होता है ताकि unauthorized person उसे access न सके।

वैसे तो DBMS software कई सारे होते हैं लेकिन उनमे से सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले program कुछ इस प्रकार हैं:
  • MySql  
  • Oracle 
  • SQL Server 
  • IBM DB2 
  • PostgreSQL 
  • SimpleDB
Database management के लिए इन सब के अलावा और भी कई सारे options हैं। कई सारे organizations तो ऐसे भी हैं जो अपने जरुरत के अनुसार खुद का सॉफ्टवेर बना कर उपयोग करते हैं।


SQL क्या है?
SQL का full form Structured Query Language है। इसके S-Q-L या कभी-कभी See-Quel भी पढ़ा जाता है। यह एक प्रकार का लैंग्वेज है जिसका उपयोग database management में किया जाता है।

इस query language के जरिये ही डेटाबेस पर create, insert, search, update, delete जैसे operation perform किये जाते हैं।

जिस प्रकार से किसी programming language का syntax होता वैसे ही इसके भी syntax और rules होते हैं।

उदहारण के लिए हमारे पास student नाम का कोई टेबल है और हम ऐसे students का नाम देखना चाहते हैं जिनकी उम्र 20 साल से कम हो तब इसका syntax कुछ इस प्रकार होगा:

SELECT name From students WHERE age < 20

जहाँ पर "name" एक कॉलम का नाम है और "students" एक टेबल का नाम है।

ऐसे ही हर प्रकार के operation के लिए SQL में अलग-अलग code निर्धारित किये गये हैं।

सारांश 

  • डेटाबेस एक ऐसा फाइल है जहाँ कई सारे डेटा को एक व्यवस्थित तरीके रखा जाता है।
  • डेटा को tables पर रखा जाता है और एक डेटाबेस में कई सारे tables हो सकते हैं।
  • DBMS का full form "Database Management Systems" है।
  • डीबीएमएस एक प्रकार का software/program या tool होता है जिसके जरिये database को manage किया जाता है।
  • MySql, SQL Server, Oracle आदि डीबीएमएस सॉफ्टवेयर के कुछ उदाहरण हैं। 
  • SQL का full form "Structured Query Language" है।
  • इस language के माध्यम से कुछ कोड लिखे जाते हैं और डेटाबेस में insert, update, delete जैसे operations perform किये जाते हैं।