Friday, 17 May 2019

Web Application क्या है? वेबसाइट और वेब एप्लीकेशन में क्या अंतर है?

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वेब एप्लीकेशन क्या है? (what is web application in Hindi?), क्या आपके मन में भी ये सवाल आ रहा है? अगर हाँ, तो आप बिलकुल सही जगह पर आये हैं। यहाँ पर हमने आपके इस सवाल का जवाब आसान शब्दों में देने की कोशिश की है।

लोगों को यह पता है की वेबसाइट क्या है लेकिन यदि कोई web app की बात करे तो कई लोगों को समझ में नही आता की आखिर यह है क्या।

जिन्हें इस बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी है तो वो भी इस बात को लेकर कंफ्यूज रहते हैं की वेबसाइट और वेब एप्लीकेशन में अंतर क्या है?

आज हम आपको web application के बारे में पूरी जानकारी देना चाहते हैं ताकि आपके मन उठ रहे सवालों के जवाब आपको मिल सके।

Web application क्या है? 

वेब एप्लीकेशन या web app एक प्रकार का software program होता है जो की किसी specific funtions को perform करने के लिए बनाया गया होता है।

यह वेब सर्वर पर stored होता है और client की तरफ से request भेजे जाने पर client के web browser पर execute होता है।

किसी computer software या कंप्यूटर एप्लीकेशन की तरह ही web app भी अपने यूजर को एक ऐसा environment provide करता है जहाँ user data enter कर पाता है,  और अलग-अलग प्रकार के tasks को भी perform कर पाता है।

Web application को बनाने के लिए स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज का उपयोग होता है जिसमे server-side scripting (जैसे: PHP, ASP आदि) और client-side scripting (जैसे: HTML, jQuery, JavaScript आदि) दोनों शामिल होते हैं।


वेबसाइट और वेब एप्लीकेशन में क्या अंतर है? (Difference Between Website and Web Application in Hindi)

Web application के बारे में जानने के बाद आपके मन में यह सवाल जरुर आ रहा होगा की आखिर website और web app में क्या difference है?

पहले तो हम आपको बता दें की यदि आप किसी वेब एप्लीकेशन को वेबसाइट कहते हैं तो आप गलत नही हैं। क्योंकि यदि आप इन्टरनेट के जरिये अपने web browser में कुछ भी देख रहे हैं तो उसे आप वेबसाइट कह सकते हैं।

लेकिन फिर भी इन दोनों के बीच कुछ न कुछ तो अंतर होगा ही...है न?

अगर हम इनके बीच के अंतर को सिर्फ दो लाइन में इसे समझाएं तो यह कुछ इस प्रकार हो सकता है:
  • वेबसाइट informational होता है।
  • वेब एप्लीकेशन interective होता है।
अब चलिए इसे थोडा विस्तार से समझते हैं:
  • वेबसाइट का मुख्य उद्देश्य visitors को सिर्फ information provide करना होता है। जैसे अपनी कंपनी, प्रोडक्ट या सर्विस आदि के बारे में लोगों बताना।
  • वेब एप्लीकेशन का goal user से input लेना और interect करना होता है। जैसे visitors से newsletter subscribe कराना, ऑनलाइन image edit करने की सुविधा देना आदि।
  • एक ऐसी वेबसाइट जहाँ one-way communication होता है यानि यूजर उस वेबसाइट के content को देख सकता है, पढ़ सकता है लेकिन कुछ input नही कर सकता और न ही कोई task perform कर सकता है तो उसे वेबसाइट कह सकते हैं।
  • ऐसी वेबसाइट जिससे यूजर interect कर सकते हैं यानि कुछ input कर सकते हैं क्या कोई function perform कर सकते हैं, तो इसे web application कहा जा सकता है।
  • Website के contents static होते हैं।
  • वेब एप्प के contents dynamic होते हैं। इसके कुछ हिस्से static भी हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें: वेबसाइट और ब्लॉग में क्या अंतर है? आपको क्या बनाना चाहिए? Website Vs Blog in Hindi

Web Apps के कुछ उदाहरण - (Examples of Web applications)

  • Facebook: सोशल मीडिया साईट जिसका उपयोग आप हर रोज करते हैं यह भी एक वेब एप्प है।
  • Gmail: ईमेल भेजना और प्राप्त करना Gmail से बहुत ही आसान है। और यह वेब एप्लीकेशन का एक बेहतरीन उदाहरण है।
  • Google Docs: इसके जरिये हम online documents create कर सकते हैं उसे download कर सकते हैं, प्रिंट कर सकते हैं या Google drive में save कर सकते हैं।
  • Pixlr: यह online image editing website है जिसपर आप अपनी फोटो अपलोड कर एडिट कर सकते हैं।
  • Netflix: Online video streaming के लिए इसका बहुत ज्यादा उपयोग होता है। इससे आप अपनी मनचाही video series कभी भी कहीं भी देख पाते हैं।
  • Codepen: ऑनलाइन code editor की बात करें हम तो यह बहुत ही बढ़िया जगह है जहाँ आप अपने कोड को लिखकर save कर सकते हैं, online exceute कर सकते हैं और दोस्तों के साथ share भी कर सकते हैं।
इन्टरनेट पर ऐसे हजारों web applications हैं और सभी के बारे में बता पाना मुश्किल है। आप जब नेट सर्फिंग कर रहें हो तो आपको ऐसी कई सारी sites देखने को मिलेंगी जो की web app के रूप में अपने users को कुछ न कुछ service provide कर रहे होंगे।


वेब एप्लीकेशन कैसे काम करता है? how a web application works?

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आप ऊपर diagram देखकर समझ सकते हैं की web application कैसे काम करता है। चलिए इसे step-by-step समझते हैं:
  • Step 1: इस process में सबसे पहले client यानि user अपने browser से web server को किसी content या page के लिए request send करता है।
  • Step 2: वेब सर्वर उस request को application server को भेज देता है जहाँ पर वह कंटेंट या पेज मौजूद होता है। 
  • Step 3: एप्लीकेशन सर्वर request के अनुसार कुछ task perform करता है और आने वाले result (data) को वेब सर्वर को भेज देता है।
  • Step 4: अब web server उस data को client के वेब ब्राउज़र को send कर देता है।
यहाँ पर इस बात को भी समझना चाहिए की web application में static और dynamic दोनों प्रकार के pages हो सकते हैं और इन दोनों pages का process अलग-अलग तरीके से होता है। 

Application server को static pages में कुछ भी changes करने की जरुरत नही पडती यह सीधे क्लाइंट को भेज दिया जाता है। लेकिन dynamic page को generate करने के लिए कुछ functions perform करने पड़ते हैं और उसके बाद जो output आता है उसे क्लाइंट को भेजा जाता है।

वेब एप्लीकेशन के क्या फायदे हैं? (Advantages of web applications in Hindi)

  • यह multiple platforms पर बड़ी आसानी से चल जाता है क्योंकि यह operating system पर depend नही करता यह browser based होता है। 
  • इसे install करने की जरुरत नही पड़ती।
  • यह यूजर के हार्ड डिस्क में स्टोर नही होता है इसलिए स्पेस की कोई समस्या नही होती।
  • हर यूजर या device के लिए अलग-अलग updates देने की जरुरत नही पडती, एक बार सर्वर में इसे update कर दिया जाए तो सारे users उसी version को user कर पाते हैं।
  • इसमें software pairacy जैसी समस्याएं कम होती हैं।
  • अधिकतर web applications को काम करने के लिए ज्यादा RAM और अन्य specifications की जरुरत नही पडती।
  • इसके लिए mantanace cost कम लगता है इसलिए यह किसी भीorganization के सस्ता होता है।
  • यह HTML, CSS जैसे languages से बनता है जिन्हें सीखना बहुत ही आसान है।

वेब एप्लीकेशन के क्या नुकसान हैं? (disadvantages of web applications in Hindi)

  • इसके लिए इन्टरनेट कनेक्शन का होना अनिवार्य है।
  • यह operating system पर नही चलता इसलिए इसमें system resources जैसे memory, cpu, file system आदि को access करने में कुछ limitations होते हैं।
  • अगर आप web app पर काम कर रहे हैं और browser crash हो जाये तो आपके unsaved process खत्म हो जाते हैं।
  • एक single app सारे devices में दिखाई देते हैं इसलिए इसे responsive होना बहुत जरुरी है ताकि सारे devices जैसे desktop, tablet, mobile आदि में बिना किसी परेशानी के दिखाई दे सके।
जैसे-जैसे इन्टरनेट की उपयोगिता बढती जा रही वैसे-वैसे web application development का काम तेज गति से बढ़ता जा रहा है। आज लगभग हर बड़ी से बड़ी आर्गेनाइजेशन अपने बिज़नस को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहती है और उनकी समस्याओं को सुलझाने और काम को आसान बनाने के लिए कम से कम खर्च में एक ऐसा प्लेटफार्म बनाना चाहती है जो सभी के लिए उपलब्ध हो। और इसके लिए web application बहुत ही बेहतरीन जरिया है।

Tuesday, 14 May 2019

डोमेन नेम क्या है? What is Domain Name in Hindi?

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कई लोग यह सवाल पूछते हैं की domain name क्या होता है? और यह काम कैसे करता है?

जब बात आती है वेबसाइट बनाने की तो आपने सुना होगा की इस काम के लिए एक डोमेन नेम खरीदना पड़ता है।

कई लोग इस बात को लेकर भी confused रहते हैं की domain, website और hosting में क्या अंतर होता है और इन सबका क्या काम होता है।

आज हम इन्ही confusions को दूर करने की कोशिश करेंगे। तो डोमेन नेम के बारे में जानकारी पाने के लिए इस आर्टिकल को जरुर पढ़ें।

Domain Name क्या है?

डोमेन नेम किसी भी वेबसाइट की पहचान को दर्शाता है: जैसे आप हमारी वेबसाइट को webinhindi.com के नाम से जानते हैं, जो की दरअसल हमारी वेबसाइट का डोमेन नेम है।

जैसा की आपको पता होगा की हर एक वेबसाइट का अपना एक IP address होता है इसी एड्रेस के जरिये उस वेबसाइट तक पहुंचा जाता है।

IP address का format कुछ इस तरह होता है: 66.102.15.255 जिसे याद रख पाना बहुत मुश्किल काम है। जरा सोचिये अगर आपको अपने पसंदीदा वेबसाइट को विजिट करने के लिए इन ढेर सारे numbers को याद रखने पड़ते तो क्या होता?

इस समस्या से निपटने के लिए ही डोमेन नाम को बनाया गया ताकि हमें इन जटिल नंबरों को याद रखना न पड़े।

अब अगर आपको किसी website को visit करना है तो IP address डालने की जरुरत नही पड़ती आप सीधे domain name enter करके वेबसाइट को access कर सकते हैं।

डोमेन कैसे काम करता है? How Domain Name Works in Hindi?

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जब आप web browser के address bar में किसी वेबसाइट का domain name enter करके submit करते हैं तो यह DNS यानि Domain Name System के पास जाता है।

DNS के पास यह जानकारी होती है की उस website का IP address क्या है और वह कौन से सर्वर पर stored है।

DNS उस domain को IP address में बदल देता है, और IP से यह पता चलता है की website कौन से server पर मौजूद है।

वेबसाइट के सर्वर को request भेजा जाता है, सर्वर उस request को process करने के बाद आखिर में आपके ब्राउज़र को data भेज देता है।

डोमेन के प्रकार - Types of Domain Name in Hindi

हर डोमेन के last में एक suffix लगा होता है जैसे .com, .in, .net आदि और इसी से यह पता चलता है की यह डोमेन किस प्रकार का है।

Domain name के कुछ types नीचे दिए गये हैं:

Top-Level Domain (TLD): इसे तीन भाग में divide किया गया है:

1. Generic Top-Level Domain (gTLDs): यह बहुत ही common domain type है जो की बहुत ज्यादा उपयोग होता है। ये कुछ इस प्रकार से हो सकते हैं:
    • .com - commercial business
    • .net - network organizations
    • .org - organizations (typically, nonprofit)
    • .gov - government agencies
    • .edu - educational institutions 
    • .mil - military
2. Country Code Top-Level Domain (ccTLD): इस प्रकार के डोमेन का extension country based होता है जैसे:
    • .in - India
    • .us - United States of America
    • .uk - United Kingdom
    • .fr - France
    • .ru - Russia
3. New Top Level Domains (nTLDs): ये कुछ नये प्रकार के domain names हैं जो की अपने आप में descriptive होते हैं यानि देखकर ही हम पता लगा सकते हैं की यह वेबसाइट किस बारे में या किस category का है जैसे:
    • .academy
    • .accountant
    • .bike
    • .cafe
    • .career
    • .dance
    • .yoga

Subdomain क्या है?

हम एक domain को अलग-अलग भाग में divide कर सकते हैं, जैसे store.yourwebsite.com, यहाँ पर 'yourwebsite' आपका डोमेन नेम है और 'store' को हम subdomain कह सकते हैं।

Subdomain का फायदा यह है की आप अपने वेबसाइट अलग-अलग sections में बाँट कर manage कर सकते हैं जो की याद रखने में भी बहुत ही आसान होता है।

अगर आपके पास पहले से डोमेन मौजूद है तो आप आसानी से subdomain बना सकते हैं और इसके लिए आपको अलग से charge देने की जरुरत नही पड़ती।

इन्टरनेट पर ऐसी कई websites भी हैं जो की free में subdomain provide करती हैं जहाँ आप अपनी website या blog बना सकते हैं।

Domain और URL में क्या अंतर हैं?

डोमेन नेम और URL (Uniform Resource Locator) दोनों को ही वेबसाइट का web address कहा जा सकता है, और यही वजह है की बहुत सारे लोग इस बात को लेकर confused रहते हैं की आखिर domain name और URL में क्या difference है, तो चलिए आज इस confusion को दूर करते हैं।

इन दोनों में अंतर समझने के लिए नीचे दिया गया image देखें:

URL Vs Domain in Hindi
URL Vs Domain in Hindi

उपर इमेज देखकर आप समझ गये होंगे की किसी webpage के complete address को URL कहते हैं जबकि domain उस URL का एक हिस्सा होता है जो किसी organization या entity को दर्शाता है।


डोमेन कहाँ से खरीदें?

यदि आपको वेबसाइट बनाना है या ब्लॉग बनाना है तो इसके लिए सबसे पहले आपको एक domain name खरीदना होगा। इन्टरनेट पर कई सारे domain name registrar हैं जिनके जरिये आप डोमेन खरीद सकते हैं।

कुछ popular domain registrar के नाम कुछ इस प्रकार हैं:

  • Godaddy
  • Bigrock
  • Namecheap
  • Bluehost
  • Hostgator
  • 1&1
  • Znetlive

वैसे तो इन्टरनेट आपको कई सारे domain name providers मिल जायेंगे लेकिन आप हमेशा ICANN certified registrar से ही डोमेन खरीदें। दरअसल ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) एक प्रकार की संस्था है जो domain providers को डोमेन बेचने के लिए authority प्रदान करती है।

डोमेन, वेबसाइट और होस्टिंग में क्या अंतर है? Website vs. Hosting vs. Domain in Hindi

लोगों के बीच एक बहुत ही बड़ा भ्रम यह है की कई लोग मानते हैं की डोमेन बुक कर लेने से एक वेबसाइट बन जाता है, जबकि ऐसा नही है।

डोमेन खरीदने के बाद और भी कई process follow करने होते हैं जिसके बाद ही एक वेबसाइट या ब्लॉग तैयार हो पाता है।

आप डोमेन, होस्टिंग और वेबसाइट के बीच के अंतर को कुछ इस तरह से समझ सकते हैं: आप अपने घर के एड्रेस को डोमेन से तुलना कर सकते हैं, घर की जमीन को होस्टिंग समझ सकते हैं और मकान को वेबसाइट।

डोमेन खरीदने से हमारी वेबसाइट का पता तय होता है इसके बाद हमें hosting खरीदना होता है जो की हमें इंटरनेट पर एक space प्रदान करता है उसके बाद हम उस स्पेस पर website के contents जैसे html pages, images, files आदि को upload करते हैं।

इस तरह से domain, hosting और website को मिलाकर एक complete website तैयार किया जाता है और उसे हम domain के द्वारा access कर पाते हैं।

हमें उम्मीद है आपको इस आर्टिकल से समझ आ गया होगा की डोमेन नाम क्या है (What is domain in Hindi) और यह काम करता है। अगर इससे जुड़े कुछ सवाल या सुझाव आपके मन में आ रहे हों तो नीचे कमेंट करके हमें जरुर बताएं।

Friday, 26 April 2019

DBMS क्या है? (What is DBMS in Hindi?)

DBMS क्या है? What is DBMS in Hindi

इससे पहले हमने आपको डेटाबेस के बारे में बताया था की database क्या होता है और इसका क्या उपयोग है। आज हम बात करने वाले हैं DBMS यानि Database Management System के बारे में। इस article में आपको  DBMS से जुड़े कई सारे सवालों के जवाब मिलेंगे जैसे DBMS क्या है? इसका क्या इतिहास है? इसका कहाँ-कहाँ उपयोग होता है? डीबीएमएस के क्या फायदे और नुकसान हैं आदि।

DBMS क्या है? (What is DBMS in Hindi?)

DBMS का full form Database Management System है। इसके नाम से ही पता चल रहा है की इसका उपयोग डेटाबेस को manage करने के लिए किया जाता है।

दरअसल यह एक प्रकार का software होता है जिसकी मदद से database को create किया जाता है और उस डेटाबेस में data insert, update और delete जैसे task इसी सॉफ्टवेर की मदद से ही perform किये जाते हैं।

यह एक interface provide करता है जिसके जरिये user उस डेटाबेस में data insert और modify भी कर सकता है।

इसके अलावा किसी application द्वारा जरुरत पड़ने पर डेटाबेस को access किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए जब आप फेसबुक पर अपना account बनाते हैं तो आपके द्वारा enter की गयी सारी जानकारियाँ Facebook के database में store हो जाती हैं। इन जानकारियों को देखने के लिए आप Facebook के application या website का उपयोग कर सकते हैं जो की उस database से linked होते हैं।

DBMS का इतिहास (DBMS History in Hindi)


  • 1960: Charles Bachman ने पहला डीबीएमएस सिस्टम डिजाइन किया 
  • 1970: Ted Codd ने आईबीएम के लिए Information Management System (IMS) बनाया जिसके लिए पहली बार relational model का उपयोग हुआ।
  • 1976: Peter Chen ने Entity-Relationship Model को गढ़ा और परिभाषित किया जिसे E-R Model के रूप में भी जाना जाता है।
  • 1980: रिलेशनल मॉडल पर आधारित DBMS का बहुत उपयोग होने लगा और SQL standard को ISO और ANSI द्वारा adopt किया गया।
  • 1985: Object-Oriented DBMS (OODBMS) विकसित हुआ। 
  • 1990 के दशक में: Relational-DBMS में ऑब्जेक्ट-ओरिएंटेशन का समावेशन हुआ। इससे Enterprise Resource Planning (ERP), Management Resource Planning (MRP), OLAP, Warehousing आदि का विकास हुआ।
  • 1991: Microsoft ने MS Access को एक personal DBMS के रूप में Windows में स्थापित किया। 
  • 1995: पहला इंटरनेट डेटाबेस application का उपयोग हुआ।
  • 1997: XML ने डेटाबेस प्रोसेसिंग के लिए आवेदन किया। कई vendors XML को DBMS उत्पादों में integrate करना शुरू किया।

Database Management System की विशेषताएं

  • किसी भी तरह के डेटा को स्टोर कर सकता है: एक डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम किसी भी तरह के डेटा को स्टोर करने में सक्षम होता है। यह नाम, और पते तक सीमित नहीं है। वास्तविक दुनिया में मौजूद किसी भी प्रकार के डेटा को DBMS में संग्रहित किया जा सकता है।
  • ACID Properties का support करना: कोई भी DBMS ACID (Atomicity, Consistency, Isolation, and Durability) जैसे गुणों का समर्थन करने में सक्षम है। 
  • Data Redundancy को कम करना: यह normalization के नियमो का पालन करती है जिससे data redundancy यानि डाटा का बिना वजह दोहराव कम हो जाता है।
  • Backup और Recovery: Database Failure जैसी समस्याएं कभी भी आ सकती हैं। ऐसे समय में यदि डाटा को रिकवर नहीं किया जा सका तो निश्चित रूप से एक बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। इसलिए सभी डेटाबेस backup और recovery की विशेषता होनी चाहिए।
  • Database Structure and Definition: एक डेटाबेस में केवल डेटा ही नहीं बल्कि डेटा की सभी संरचनाएं और परिभाषाएं भी होनी चाहिए। यह डेटा खुद दर्शाता है कि इस पर किस प्रकार के tasks perform की जानी चाहिए। यह data structre, type, format और उनके बीच के संबंध को दर्शाता है। 
  • Data Integrity and Security: यह database की quality और विश्वसनीयता को बढाता है। यह डेटाबेस की unauthorized access को रोकता है और इसे अधिक सुरक्षित बनाता है। 
  • Database Concurrency: इस बात की कई संभावनाएं हैं कि एक ही समय में कई उपयोगकर्ता या applications एक ही डेटा को एक्सेस कर रहे होंगे। ऐसे में समस्याएं आ सकतीं हैं लेकिन Concurrency control के जरिये डीबीएमएस उन्हें बिना किसी समस्या के डेटाबेस का उपयोग करने के लिए मदद करता है।

डीबीएमएस का कहाँ-कहाँ उपयोग होता है?

  • बैंकिंग 
  • रेलवे रिजर्वेशन सिस्टम
  • एयरलाइन्स
  • लाइब्रेरी मैनेजमेंट सिस्टम
  • स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी 
  • सोशल मीडिया साइट्स
  • टेलीकम्यूनिकेशन
  • ऑनलाइन शौपिंग
  • मिलिट्री 
  • एच आर मैनेजमेंट 
  • मैन्युफैक्चरिंग

Database Management Systems के components

डीबीएमएस सिस्टम के चार मुख्य componets होते हैं:
  1. डाटा: डेटाबेस में स्टोर होने वाला डाटा जो की कोई number, character, date, या कोई logical value हो सकता है।
  2. हार्डवेयर: कंप्यूटर, स्टोरेज डिवाइस, इनपुट-आउटपुट डिवाइस आदि।
  3. सॉफ्टवेयर: ऑपरेटिंग सिस्टम, DBMS software, application programs आदि।
  4. यूजर: यहाँ पर इसके तीन प्रकार के यूजर हो सकते हैं:
    1. Database Administrator (DBA): डेटाबेस का डिजाईन और मेंटेनेंस का काम करता है।
    2. Application Programmer: ऐसे एप्लीकेशन प्रोग्राम का निर्माण करता है जिससे डेटाबेस का उपयोग किया जा सके।
    3. End-user: जो अलग-अलग प्रकार के प्रोग्राम और application के मध्यम से डेटाबेस में से data को access करता है और insert, update, delete जैसे operations perform करता है।

DBMS Software कौन-कौन से हैं?

कुछ popular DBMS software के नाम कुछ इस प्रकार हैं:
  • MySQL
  • SQLite
  • Microsoft SQL Server
  • Oracle
  • Microsoft Access
  • dBASE
  • IBM DB2
  • PostgreSQL
  • Foxpro
  • MariaDB
  • NoSQL आदि।

डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम के प्रकार (Types of DBMS in Hindi)

DBMS मुख्य रूप से 4 प्रकार के होते हैं:
  1. Hierarchical databases: इसका structure एक tree के सामान होता है जिसमें केवल एक root होता है। यहाँ पर relationship को child और parent के रूप में दिखाया जाता है। यहाँ एक parent के कई सारे child हो सकते हैं लेकिन एक child का केवल एक ही parent होता है। इस प्रकार के relationship को one-to-many relationship (1:N) कहा जाता है।
  2. Network databases: इस प्रकार के मॉडल में एक child के एक से अधिक parent भी हो सकते हैं। इस प्रकार के सम्बन्ध को many-to-many relationship कहा जाता है।
  3. Relational databases: इस DBMS model में डाटा को row और column के जरिये table के रूप में स्टोर किया जाता है। इससे data को खोजना बहुत ही आसान होता है। इसे relational इसलिए कहा जाता है क्योंकि कई सारे tables के बीच कुछ न कुछ सम्बन्ध होता है। 
  4. Object-oriented databases: इस प्रकार के डेटाबेस में data को object के रूप में store किया जाता है। यहाँ दो या अधिक objects के बीच अलग-अलग प्रकार के relationships हो सकते हैं। ऐसे database को बनाने के लिए object-oriented programming language की जरुरत पडती है।

DBMS के क्या फायदे हैं? (Advantages of DBMS in Hindi)

  • Data redundancy को कम करता है।
  • Authorized users के बीच database को share करना आसान है।
  • डाटा को secure रखना आसान है बिना permission या authorization के कोई भी डेटाबेस को access नही कर सकता।
  • Privacy का भी ख्याल रखा जा सकता है। Database Administrator यह तय कर सकता है की कौन सा यूजर किस level के data को access कर सकता है।
  • File processing system की तुलना में database में data ज्यादा consistent रहता है।
  • यह multi user environment को support करता है।
  • डेटाबेस में संग्रहीत डेटा हमेशा सही और सटीक होना चाहिए। सही डेटा को संग्रहीत करने के लिए integrity constraints का उपयोग किया जाता है क्योंकि कई सारे users हैं जो डेटाबेस में डेटा फ़ीड करते हैं। उदाहरण के लिए, छात्रों द्वारा प्राप्त अधिकतम अंक कभी भी 100 से अधिक नहीं होने चाहिए।
  • Data atomicity बहुत ही महत्वपूर्ण है। DBMS में इस बात का ख्याल रखा जाता है की transaction हमेशा complete होना चाहिए। यदि कोई transaction अधूरा है तो उसे roll back कर दिया जाता है। जैसे यदि ऑनलाइन टिकट बुकिंग करते समय खाते से पैसे कट जाए और टिकट बुक न हो तो अपने आप पैसे refund हो जाने चाहिए।
  • DBMS की वजह से application development में भी बहुत ही कम समय लगता है।
  • Data migration की मदद से हम frequently use होने वाले data को कुछ इस तरह से store कर सकते हैं की उसे quickly access किया जा सके।

डीबीएमएस के क्या नुकसान हैं? Disadvantages of DBMS in Hindi

  • Hardware और software का cost अधिक हो सकता है।
  • DBA, application programmer, operators जैसे staffs जरुरत पड़ती है और इनको इसके लिए training देना जरुरी है।
  • कई बार यह बहुत ही complex system होता है।
  • DBMS काफी बड़ा सॉफ्टवेयर है, इसलिए इसे कुशलतापूर्वक चलाने के लिए system में बहुत सारी जगह और मेमोरी की आवश्यकता होती है।
  • जैसा कि हम जानते हैं कि DBMS में, सभी फाइलें एक ही डेटाबेस में संग्रहीत की जाती हैं, इसलिए database failure की संभावना अधिक हो जाती है। अचानक हुए failure से मूल्यवान डेटा की हानि हो सकती है। 
उम्मीद है आपको यह आर्टिकल (DBMS क्या है?) पसंद आई होगी और डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम के बारे में ये सारी जानकारियाँ आपके काम आएँगी।

Tuesday, 9 April 2019

Web portal क्या है? पोर्टल और वेबसाइट में क्या अंतर है?

what is web portal in Hindi

आपने कहीं न कहीं वेब पोर्टल का नाम जरुर सुना होगा। कई बार वेबसाइट और पोर्टल दोनों को एक ही समझा जाता है। लेकिन क्या इन दोनों में कोई अंतर नही है? आखिर वेब पोर्टल क्या होता है? इसका क्या काम है? इन सभी सवालों के जवाब आपको इस आर्टिकल में मिलेंगे।
वेब पोर्टल क्या है? What is Web Portal in Hindi? दरअसल यह एक प्रकार का वेबसाइट ही है जहाँ अलग-अलग sources से कई सारे सूचनाओं को एकत्रित कर एक single platform पर उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन इसे access करने के लिए यूजर को लॉग इन करना पड़ता है जिसके लिए username और password की जरुरत पड़ती है।

यह एक प्रकार का विशेष रूप से डिजाईन किया गया वेबसाइट होता है जो किसी विशेष काम के लिए उपयोग होता है। आजकल लगभग हर बिज़नस या आर्गेनाइजेशन में पोर्टल की जरुरत होती है जिसमे वहां के employee को एक ही स्थान पर सारी जानकारियाँ मिल जातीं हैं।

उदाहरण के लिए किसी हॉस्पिटल के लिए एक patient portal बनाया जा सकता है। जिसपर वहां के डॉक्टर्स लॉग इन करके उस हॉस्पिटल के सारे मरीजों की जानकारी एक ही स्थान पर देख सकते हैं। यह एक प्रकार का प्राइवेट पोर्टल होगा जो सिर्फ उस हॉस्पिटल के स्टाफ के लिये उपयोगी होगा।

इसके अलावा कई सारे पब्लिक पोर्टल्स भी होते हैं जहाँ पर कोई भी अपना account बना कर पोर्टल की सुविधाओं का लाभ उठा सकता है।

ज्यादातर पोर्टल्स किसी विशेष category पर बनाये जाते हैं और user को personalized information दिया जाता है यानी यूजर को उनके जरुरत के अनुसार अलग-अलग तरह की जानकारियाँ दी जातीं हैं।

जैसे job portal, जहाँ सिर्फ नौकरी और रोजगार जैसी सूचनाएं यूजर तक पहुंचाई जाती हैं। लेकिन हर नौकरी की सूचना हर यूजर को नही भेजी जाती यह निर्भर करता है यूजर की योग्यता पर।

जब naukri. com जैसे जॉब पोर्टल पर आप register करते हैं तो वहाँ आप अपना resume डाल सकते हैं और अपनी शिक्षा, अनुभव और योग्यता की जानकारी दे सकते हैं। इसके बाद आपके द्वारा दी गयी इन सारी जानकारियों के अनुसार आपके योग्य नौकरी की सूचनाएं आपको दी जाती हैं।

इन वेब पोर्टल्स को डेस्कटॉप, मोबाइल फ़ोन जैसे किसी भी डिवाइस के द्वारा इन्टरनेट के जरिये कहीं से भी  access किया जा सकता है।

पोर्टल कितने प्रकार के होते हैं? Types of Web Portals in Hindi वैसे तो वेब पोर्टल के कई प्रकार के होते हैं लेकिन उनमे से मुख्य प्रकारों के नाम नीचे दिए गये हैं:
  • Vertical Portals: इस प्रकार के पोर्टल में किसी एक विषय, इंडस्ट्री, या क्षेत्र के बारे में जानकारी होती है। उदाहरण के लिए यदि कोई बिज़नस पोर्टल है तो उसमे केवल बिज़नस के बारे में ही जानकारियाँ होंगी।
  • Horizontal Portals: इसे "मेगा पोर्टल" भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ कई सारे topics के बारे में contents उपलब्ध होते हैं। 
  • Enterprise Portals: यह privat portal होता है जो किसी organization के कर्मचारियों के लिए बनाया जाता है। इसपर employee की सुविधा और सहायता के लिए तरह-तरह के information और services provide किये जाते हैं। 
  • Knowledge Portals: इस पोर्टल का उद्देश्य होता है की जानकारियों को सही और आसान तरीके यूजर तक पहुँचाया जाय। 
  • Market Place Portals: इसका उपयोग business to business (B2B), business to customer (B2C) के support के लिए किया जाता है। जैसे ecommerce की site जहाँ customer आसानी से products ढूंढ पाता है, इसे मार्केटप्लेस पोर्टल कहा जा सकता है।
वेब पोर्टल की विशेषताएं (Features of Web Portal)
  • लॉग इन करना जरुरी होता है: पोर्टल में दी गयी सुविधाओं को पाने के लिए यूजर को login करना पड़ता है।
  • पोर्टल के मेम्बेर्स ही access कर सकते हैं: यदि आप registered member नही हैं तो आप इसपर नही कर पायेंगे।
  • Personalized Information: हर यूजर सारी जानकारियों को देख नही सकता उसको उसके role और permission के अनुसार ही जानकारियां दिखाई जाती हैं।
  • Domain Specific: किसी एक category या एक विशेष क्षेत्र के लोगों के लिए हो सकता है।
  • Dynamic Contents: एक वेबसाइट के मुकाबले पोर्टल पर information लगातार बदलते रहते हैं क्योंकि अलग-अलग यूजर को उनके काम की ही जानकारी और services दी जाती हैं।
  • Communication: यह भी पोर्टल का एक feature होता है जिससे मेम्बर आपस में बात कर सकते हैं और एक दुसरे के संपर्क में रह सकते हैं।
वेब पोर्टल्स के कुछ उदहारण
Web portals के कई सारे examples हैं जिनमे से कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें हम हर रोज use करते हैं। ऐसे popular web portals के नाम नीचे दिए गये हैं।
  • Google
  • Yahoo!
  • Facebook
  • YouTube
  • Twitter
  • Blogger
  • Amazon
  • Flipkart
  • PayTM
  • Naukri
  • Monster
  • OnlineSBI
  • UIDAI - Aadhar Card Portal
  • TimesOfIndia
  • 99acres
  • Yatra
ये सारे पोर्टल्स अपने users को personalized information provide करते हैं। जैसे यदि हम गूगल की बात करें तो user के country, area और personal settings के अनुसार search results दिखाता है।

पोर्टल और वेबसाइट में क्या अंतर है? Website Vs Web Portal in Hindi

वेबसाइट वेब पोर्टल्स
इसे कोई भी publicaly access कर सकता है। यह private होता है और इसे केवल registerd users ही access कर सकते हैं।
लॉग इन करने की जरुरत नही पडती। लॉग इन करना पड़ता है।
इसके content सभी के लिए एक सामना होते हैं। अलग-अलग यूजर के लिए अलग-अलग कंटेंट हो सकते हैं।
Website में communication की सुविधा नही होती। यहाँ पर two-way communication होता है। users पोर्टल पर बात कर सकते हैं।
वेबसाइट का उद्देश्य किसी कंपनी, प्रोडक्ट आदि के प्रचार के लिए किया जाता है इस लिए इस पर अधिक से अधिक traffic drive करने की कोशिश की जाती है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच सके। जबकि एक portal का काम users, clients, employees आदि को सुविधाएँ प्रदान करना होता है। यानी इसे विशेष ग्रुप के लोगों को ध्यान में रख कर बनाया जाता है।
आगे पढ़ें:

हमें उम्मीद है की यह आर्टिकल पढ़ कर आपको समझ आ गया होगा की web portal क्या होता है और website और portal में क्या differences हैं

इस बारे में आप अपना सवाल या सुझाव नीचे comment करके हमें जरुर बताएं।

Thursday, 14 March 2019

सर्च इंजन क्या है? कितने प्रकार के होते हैं? यह कैसे काम करता है?

What is search engine in Hindi

हम अपने मोबाइल से या कंप्यूटर से गूगल पर हर रोज कुछ न कुछ सर्च करते हैं। आज भी आपने कुछ न कुछ  जरुर सर्च किया होगा।

सर्च इंजन क्या है? (What is search engine in Hindi?) आज सर्च इंजन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक हिस्सा बन गयीं हैं। अब वो समय चला गया जब लोग सिर्फ पढाई करने के लिए गूगल पर जाते थे, आज लोग अपनी हर छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान सबसे पहले गूगल पर ढूंढते हैं।

आज किसी मूवी की रेटिंग देखनी हो, कोई रेसिपी बनाने की विधि देखनी हो, अपने आसपास होटल ढूँढना हो या हमें किसी भी चीज की जानकारी चाहिए हो तो हम सीधा गूगल पर टाइप कर देते हैं और सारी जानकारियाँ हमें मिल जाती हैं।

लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है की आखिर गूगल काम कैसे करता है? एक सर्च इंजन कैसे काम करता है?

इन्टरनेट पर अरबों की संख्या में जानकारियाँ भरी पड़ी हैं, लेकिन इन सब के बीच में से सिर्फ वही जानकारियाँ हमें दिखाई देती हैं जो हम खोज रहे होते हैं।

आखिर ये सब होता कैसे है?

इसे समझने के लिए आपको सर्च इंजन के काम करने का तरीका जानना होगा। और इसके लिए आप यह आर्टिकल शुरू से अंत तक जरुर पढ़ें।


सर्च इंजन क्या है? What is Search Engine in Hindi? Search engine एक प्रकार का प्रोग्राम है जो की वर्ल्ड वाइड वेब पर मौजूद जानकारियों को keywords के जरिये ढूँढने में users की मदद करता है।

जब भी यूजर कोई कीवर्ड या सवाल सर्च बॉक्स में enter करके submit बटन पर क्लिक करता है तो सर्च इंजन यह समझने की कोशिश करता है की यूजर क्या ढूंढना चाहता है, और वह उससे जुडी जानकारियों को खोजकर व्यवस्थित तरीके से Search Engine Result Page (SERP) पर दिखाता है।

एक वेब सर्च इंजन के पास automatic programs होते हैं जो की इन्टरनेट पर मौजूद websites और webpages पर जाकर लगातार जानकारियाँ इक्कठा करते रहते हैं।

उसके बाद उन web pages की जानकारियों को व्यवस्थित तरीके से अपने डेटाबेस में स्टोर रखता है ताकि जब जरुरत पड़े तो आसानी से ढूंढा जा सके।

अपने यूजर को सही और एकदम सटीक जानकारी देना किसी भी सर्च इंजन की पहली प्राथमिकता होती है।

सर्च इंजन कैसे काम करता है? How Search Engine Works in Hindi सर्च इंजन कई प्रकार के होते हैं और हर सर्च इंजन के काम करने का तरीका अलग-अलग होता है। हर search engine का अपना एक सीक्रेट mathematical formula होता है जिसे algorithm कहा जाता है।

यही algorithm तय करता है की सर्च करने पर कौनसी वेबसाइट सबसे पहले और बाद में आने वाली है यानि result page पर किसी वेबसाइट की रैंकिंग कितनी होगी यह अल्गोरिथम से ही तय होता है।

हालांकि गूगल, याहू जैसे सर्च इंजन द्वारा लोगों को अपनी वेबसाइट की रैंकिंग बढाने के लिए टिप्स तो दिए तो जाते हैं लेकिन उनके alogrithms के बारे में पूरी जानकारी नही दी जाती ताकि कोई उसका गलत तरीके से उपयोग न कर सके।

सर्च इंजन का मुख्य काम अलग-अलग web pages पर जाकर जानकारियों को खोजना, उन्हें organize करना और content की quality के अनुसार ranking करना होता है।

एक crawler-based search engine जैसे Google, Yahoo, Bing आदि को 3 steps follow करने होते हैं:
  1. Crawling
  2. Indexing 
  3. Ranking

Crawling:
यह सबसे पहला चरण होता है, इसमें कुछ automatic programs जिसे crawler, bot या spider कहा जाता है ये वर्ल्ड वाइड वेब पर घूम-घूम कर information collect करते रहते हैं।

ये क्रॉलर हर सेकंड में सैकड़ों website के pages को scan करता है यह पेज में उपलब्ध किसी भी लिंक के जरिये दुसरे पेज तक पहुँच जाता है और ऐसे ही यह लगातार पूरे इन्टरनेट पर घूमता रहता है। 

किसी भी वेबसाइट में घुसने पर ये crawler वहां उपलब्ध कई तरह की जानकारियों को एकत्रित करते हैं जैसे:
  • Page का title और description
  • पेज में कौन-कौन से keywords use किये गये हैं।
  • Images और videos हैं या नही।
  • Website में कितने pages हैं।
  • कौन कौन से links हैं।
  • Page को कब update किया गया है।
  • कौन-कौन से पेज को delete किया गया है आदि।
किसी पेज को दोबारा कब crawl किया जायेगा यह search engine के algorithm और rules द्वारा तय होता है।

Indexing:
Crawling केवल जानकारियों को collect करने का एक प्रोसेस था। अब इसके बाद बारी आती है indexing की।

इस step में crawl किये गये जानकारियों को सही क्रम में व्यवस्थित करके सर्च इंजन के डेटाबेस में store किया जाता है ताकि सर्च किये जाने पर जल्दी से इन information को process करके user को दिखाया जा सके।

इसे आप किसी किताब के index page से तुलना कर सकते हैं। जिस प्रकार यदि हमें किसी book के अंदर कोई specific topic ढूंढनी हो तो हम सबसे पहले index पर जा कर पता करते हैं की वह कौन से पेज पर है।

गूगल भी ठीक इसी तरह का एक इंडेक्स तैयार करता है जिसमे एक टेबल के फॉर्मेट में सभी web pages की जानकारी जैसे पेज का title, descripting, keywords, internal links, external links आदि को store करता है।

Ranking:
यह तीसरा और सबसे आखरी स्टेप है। इस स्टेप में यह decide होता है की कौन सी query या keyword search करने पर Search Engine Result Page (SERP) में कौन-कौन से और किस क्रम में pages दिखाई देंगे।

ये सारे काम search engine के ranking algorithm के द्वारा होता है जो की बहुत ही complex mathematical formula से बना होता है जिसे समझ पाना काफी कठिन है।

आखिर सर्च इंजन का ranking algorithm कैसे काम करता है? जैसा की मैंने ऊपर बताया की इसे समझना काफी मुश्किल काम है, मुश्किल इसलिए क्योंकि कोई भी सर्च इंजन अपने एल्गोरिथम के बारे में पूरी जानकारी नही देता और कई सारी चीजों को गोपनीय रखा जाता है।

Google अपने SERP में किसी वेबसाइट की रैंकिंग को निर्धारित करने के लिए 200 से भी अधिक rules का पालन करता है। लेकिन किसी को भी निश्चित तौर पर यह नही पता की वे rules क्या-क्या हैं। इसे हमेशा secret रखा जाता है।

किसी भी रैंकिंग एल्गोरिथम का मुख्य काम pages को उनकी quality content के अनुसार रैंक करना होता है। ताकि उपयोगकर्ताओं को सही और सटीक information provide किया जा सके।

सही तरीके से रैंकिंग करने के लिए गूगल को अपने algorithm को समय-समय पर update करना पड़ता है।

हर साल गूगल अपने एल्गोरिथम में 500 से 600 बार बदलाव करता है।

यही वजह है की यदि हम कुछ साल पहले की बात करें तो किसी के लिए भी अपनी वेबसाइट को रैंक कराना आसान काम होता था। लेकिन अब यह बहुत ही जटिल काम हो गया है।

अब कुछ भी सर्च करने पर सिर्फ वही websites top 10 पर आते हैं जिनके content में quality हो और जो users को सही जानकारी दे रहा हो।

खैर, चलिए वापस लौटते हैं अपने पॉइंट पर और एक मोटे तौर पर समझने की कोशिश करते हैं की search algorithm कैसे काम करता है।

गूगल के अनुसार search algorithm नीचे दिए गये कुछ steps को follow करता है:

1. सर्च किये गये शब्दों (query) को समझना: सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम होता है आपके द्वारा search bar में enter किये गये शब्दों को समझना।

शब्द कौन सी भाषा में है और उसका क्या अर्थ है, उसके और कौन-कौन से समानार्थी शब्द हो सकते हैं यह जानना जरुरी है ताकि सही परिणाम दिखाया जा सके।

कई बार user अपनी query में speling mistakes भी करता है जिसे समझना और ठीक करने का काम भी किया जाता है।

कई बार एक ही शब्द के कई सारे meanings होते हैं, ऐसी स्थिति में sentance को समझकर उससे सम्बन्धित रिजल्ट दिखाने का काम भी एल्गोरिथम द्वारा किया जाता है।

इसके अलावा कई सारे keywords ऐसे भी होते हैं जिनके search results कुछ अलग format में दिखाए जाते हैं जैसे यदि आप "restaurant near me" search करें तो आपको आपके आसपास में उपलब्ध रेस्टोरेंट की जानकारी उनकी rating और map के साथ दिखाई जाती है।

यदि आप "40+50" सर्च करें तो इसे समझ आ जाता है की यह गणित का सवाल है और इसका सर्च रिजल्ट कुछ ऐसा दिखाई देता है:
Search query में ऐसे keywords को पहचानने और उससे जुड़े data को विशेष format में दिखाने का काम भी इसी algorithm का ही होता है।

2. Index से मिलान करना: सर्च किये गये Keywords को समझने के बाद इसे index में store किये गये data से match किया जाता है और इससे जुड़े हुए pages को खोजा जाता है।

यहाँ ध्यान रखा जाता है की आप कौनसे भाषा में सर्च कर रहे हैं और उसी भाषा में लिखे गये pages को खोजा जाता है।

किसी पेज को select करते समय यह देखा जाता है की वह शब्द उस पेज में कितनी बार और कहाँ-कहाँ उपयोग किया गया है, देखा जाता है की ये keywords page के title में लिखा गया है या headline में या body में use किया गया है। इससे यह समझने में आसानी होती है की जो information user द्वारा serach किया जा रहा है उसके बारे में जानकारी उस page में यह या नही।

3. उपयोगी web pages की ranking करना: 
इन्टरनेट पर करोड़ों websites हैं ऐसे में यह बिलकुल सम्भव है की उस query से सम्बन्धित सैकड़ों webpages हों। इस स्थिति में webpages को उनकी quality के अनुसार rank किया जाता है और SERP में सबसे बेहतर पेज के URL को पहले दिखाया जाता है।

पेज की quality तय करने के लिए कई सारे factors ध्यान में रखे जाते हैं जैसे:
  • Search की गयी कीवर्ड पेज में कितनी बार repeat हो रही है।
  • पेज की जानकारी कितनी fresh है।
  • वेबसाइट की विश्वसनीयता कितनी है।
  • User experience (UX) का ध्यान रखा गया है या नही 
  • Site की speed सही है या नही आदि।
इन सबके अलावा और भी सैकड़ों factors होते हैं जिनका पेज रैंकिंग के समय ध्यान रखा जाता है।

4. Context का ध्यान रखना:
इस स्टेज में कुछ extra information जैसे आपकी location, country, area, past search history और search settings का ध्यान में रखकर data को इस प्रकार से filter किया जाता है की दिखाई देने वाला result आपके लिए उपयुक्त हो।

5. Result show करना
अब आखिर में रिजल्ट show किया जाता है जिसमे ध्यान रखा जाता है की यूजर के सवाल का जवाब सही तरह से दिखाया जाय इसमें सिर्फ text content ही नही बल्कि images, videos जो भी उस query के बारे में बेहतर हो उसे दिखाया जाता है।

सर्च इंजन कितने प्रकार के होते हैं? Types of Search Engine in Hindi सर्च इंजन मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं:
  1. Crawler-Based Search Engines
  2. Web Directories
  3. Hybrid Search Engines
  4. Meta Search Engines
Crawler-Based Search Engines:
इस प्रकार के सर्च इंजन में crawler या bot का उपयोग होता है crawling, indexing, और ranking जैसे steps follow किये जाते हैं जिनके बारे में हम पहले ही ऊपर बता चुके हैं।

इस तरह के सर्च इंजन के उदहारण हैं:
  • Google
  • Yahoo!
  • Bing
  • DuckDuckGo
  • Yandex
  • Ask

Web Directories:
यह एक प्रकार का डायरेक्टरी सिस्टम होता है जहाँ कई सारे websites की link और उनके बारे में जानकारी दी जाती है। इसमें websites को अलग-अलग categories के अनुसार list बना कर दिखाया जाता है।

इस डायरेक्टरी में अपनी वेबसाइट को register करने लिए website का owner अपनी साईट की category और short descripting लिखकर submit करता है।

यहाँ कोई automatic system नही होता, सबमिट किये गये साईट को editor द्वारा manually review किया जाता है और डायरेक्टरी के नियमो के अनुसार सही पाए जाने पर add कर लिया जाता है अथवा reject कर दिया जाता है।

इसपर एक search box होता है जिसके जरिये वेबसाइट को खोजा जा सकता है। सर्च किये गये शब्दों को directory में उपलब्ध sites के description से match किया जाता है और सर्च रिजल्ट के रूप में match होने वाले sites की लिस्ट दिखाई जाती है।

Web directories के कुछ उदाहरण:
  • A1WebDirectory
  • Blogarama
  • 9sites 
Hybrid Search Engines:
हाइब्रिड सर्च इंजन रिजल्ट दिखाने के लिए crawler और directories दोनों का उपयोग करते हैं। जैसे गूगल crawling method के अलावा डायरेक्ट्रीज से भी किसी वेबसाइट के बारे में जानकारियाँ जुटा सकते हैं।

पुराने समय में directories का बहुत उपयोग होता था, अगर आपकी साईट कई सारी web directories में listed है तो आप बड़ी आसानी से गूगल में रैंक कर सकते थे। क्योंकि उस समय Google वेब डायरेक्टरी को काफी प्राथमिकतायें देता था।

लेकिन अब धीरे-धीरे web directories की value कम होती जा रही है और hybrid सर्च इंजन crawler-based search engine बनते जा रहे हैं।

हाइब्रिड सर्च इंजन के उदाहरण हैं:
  • Google
  • Yahoo!
Meta Search Engines:
ऐसे सर्च इंजन जो किसी अन्य सर्च इंजन से data ला कर रिजल्ट दिखाते हैं, मेटा सर्च इंजन कहलाते हैं। जब यूजर कोई query enter करता है तो यह उस query को अलग-अलग कई सारे अन्य search engines पर ले जाकर सर्च करता है और सभी के results को ला कर उसपर खुद का algorithm apply करता है और उसे filter करके यूजर को दिखाता है।

मेटा सर्च इंजन के examples:
  • Dogpile
  • Metacrawler
कुछ अन्य प्रकार के search engines:
आपको इन्टरनेट पर कुछ ऐसे सर्च इंजन भी मिलेंगे जो की किसी विशेष category पर सर्च करने के लिए बनाये गये हैं। इनके कुछ examples नीचे दिए गये हैं:

Shopping के लिए:
  • Google Shopping 
  • Yahoo Shopping
  • PriceGrabber 
News खोजने के लिए:
  • Google News
  • Yahoo News
Image search engines:
  • Google Image
  • Bing Image
  • Yahoo! Image
Reverse Image Search Engines:
  • TinyEye
  • Pinterest
  • Google Reverse Image search
गाने और म्यूजिक खोजने के लिए:
  • Allmusic
  • Last FM
  • Sound Click
  • BeeMP3
इस तरह के कई प्रकार के सर्च इंजन हैं जिनका उपयोग आप अलग-अलग काम के लिए कर सकते हैं।

दुनिया के 10 सबसे बेस्ट सर्च इंजन कौन से हैं? Top 10 Best Search Engines
चलिए अब जानते हैं की इन्टरनेट पर मौजूद सबसे बेहतर search engines कौन-कौन से हैं। 10 सबसे बेस्ट सर्च इंजन के नाम उनकी लोकप्रियता आधार पर कुछ इस प्रकार हैं:

  1. Google
  2. Bing
  3. Baidu
  4. Yahoo!
  5. Yandex
  6. Ask
  7. AOL
  8. DuckDuckGo
  9. WolframAlpha
  10. Dogpile
इस लिस्ट में सबसे ऊपर गूगल है जो दुनिया no. 1 सर्च इंजन है। Netmarketshare के report (फरवरी 2019) के अनुसार पूरे वर्ल्ड में 70% searches गूगल पर हुए हैं। 

इस पोस्ट में हमने आपको बताया की सर्च इंजन क्या है? यह कैसे काम करता है? और कितने प्रकार के होते हैं।हमें उम्मीद है आपको सर्च इंजन के बारे में ये जानकारियाँ पसंद आई होंगी। इस बारे में आप अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरुर शेयर करें। धन्यवाद!