Wednesday, 16 January 2019

Scripting Language क्या है? स्क्रिप्टिंग और प्रोग्रामिंग में क्या अंतर है?

Scripting language kya hai?

आप PHP के बारे में तो जानते ही होंगे।

क्या आपको पता है की PHP एक scripting language है?

हो सकता है आपको पता हो, अगर आप इन्टरनेट पर PHP का definition देखें तो उसमे लिखा होता है की यह एक स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज है।

लेकिन कई बार लोगों को यह नही पता होता की scripting language क्या है?

फिर लोग इस बात को लेकर भी confuse रहते हैं की आखिर scripting और programing language में क्या अंतर है?

लेकिन यदि आप प्रोग्रामर, वेब डेवलपर या वेब डिज़ाइनर बनना चाहते हैं तो आपको इसके बारे में जानकारी जरुर होनी चाहिए, और इसके लिए आपको यह आर्टिकल जरुर पढना चाहिए।

स्क्रिप्टिंग क्या है? Script एक प्रकार का प्रोग्राम होता है जिसमे कई सारे प्रोग्रामिंग instructions यानि codes लिखे होते हैं जो की runtime पर interpret होते हैं।

Runtime पर interpret होने का मतलब यह है की जब कोई application running में हो या चल रहा हो तब कोड को read करके execute किया जाता है।

इसे आसानी से समझने के लिए हम फेसबुक का उदाहरण लेते हैं, आप जब किसी पोस्ट को लाइक करते हैं तब क्या होता है? क्या like बटन पर क्लिक करने से पेज refresh होता है?

नही, पेज रिफ्रेश नही होता, लेकिन फिर भी हमारा काम हो जाता है। ऐसा क्यों?

क्योंकि वहां पर runtime में एक स्क्रिप्ट execute होता है और वह बिना किसी रूकावट के हमारा काम कर देता है।

ऐसे स्क्रिप्ट को बनाने के लिए scripting language का उपयोग किया जाता है जो की एक प्रकार का प्रोग्रामिंग लैंग्वेज है।

Scripting language की एक खासियत यह है की यह किसी अन्य language के साथ communicate कर सकती है।

इन scripts को HTML जैसे लैंग्वेज के साथ embed किया जा सकता है यानि HTML document में आप scripting के codes भी लिख सकते हैं।

Webpage में कई प्रकार के events perform होते हैं जैसे button click, key press करना, किसी element जैसे image, paragraph, heading आदि पर mouse hover करना। इन events का response क्या होगा यह हम scripting के जरिये define कर सकते हैं।

इसके जरिये आप अपनी वेब पेज पर कुछ extra features जैसे drop-down menu, image slider, animation effects आदि भी जोड़ सकते हैं।

Scripting का उपयोग सिर्फ वेबपेज में ही नही बल्कि operating systems में भी होता है। जहाँ यह किसी task को automate करने के लिए use किया जाता है।

स्क्रिप्टिंग और प्रोग्रामिंग में क्या अंतर है? लगभग सारे स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज प्रोग्रामिंग लैंग्वेज होते हैं।

अब आपके दिमाग में यह सवाल जरुर आ रहा होगा की आखिर scripting language और programming language में क्या difference है?

तो चलिए नीचे टेबल के माध्यम से जानते हैं की आखिर इनके बीच क्या अंतर है।

Programming language Scripting language
प्रोग्रामिंग में कोड execute होने से पहले compile होता है। स्क्रिप्टिंग में कोड compile करने की जरुरत नही है। यह runtime में interpret होता है।
किसी अन्य लैंग्वेज के साथ इसे embed करने की जरुरत नही है। ज्यादातर इसे HTML जैसे लैंग्वेज के साथ embed किया जाता है।
एक बार compile होने के बाद प्रोग्राम के source code को नही देखा जा सकता। वेब ब्राउज़र पर हम स्क्रिप्ट के source code को देख सकते हैं।
compile होने पर यह binary file बनाता है जिसके लिए अतिरिक्त memory की जरुरत पड़ती है। इससे किसी प्रकार की बाइनरी फाइल नही बनती और न ही यह अतिरिक्त स्पेस लेता है।
इसके कोड complex होते हैं। पूरे प्रोग्राम के लिए कई सारे codes लिखने पड़ते हैं। इसमें कुछ लाइन के कोड से ही काम हो जाता है।
Complexity के कारण इसे सीखने में समय लगता है।यह बहुत आसान होता इसलिए सीखने में समय नही लगता।
C, C++, Java आदि प्रोग्रामिंग लैंग्वेज के कुछ उदाहरण हैं। PHP, ASP, JSP, Python, JavaScript आदि स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज के examples हैं।

Client-side scripting क्या है?

Client-side scripting in Hindi

क्लाइंट-साइड स्क्रिप्टिंग के जरिये ऐसे स्क्रिप्ट तैयार किये जाते हैं जो की क्लाइंट यानि यूजर के सिस्टम (वेब ब्राउज़र) में रन होते हैं।

इस प्रकार के अधिकतर scripts HTML documents के अंदर लिखे जाते हैं। इनका काम वेब पेज को interactive बनाना होता है।

आपने कभी न कभी किसी वेबसाइट पर फॉर्म जरुर भरा होगा, आपने देखा होगा की जब हम फॉर्म के किसी फील्ड को blank छोड़ देते हैं और submit बटन पर क्लिक करते हैं तो सबमिट होने से पहले ही एक error दिखाई देता है जो बताता है की हमने एक field को खाली छोड़ दिया है। इस प्रोसेस को form validation कहा जाता है।

Form validation में यूजर द्वारा डाले गये inputs को validate किया जाता है। इस तरह के काम को JavaScript के द्वारा किया जाता है जो की एक प्रकार का client-side scripting है।

एक बार स्क्रिप्ट लोड हो जाने के बाद इसे सर्वर से interect करने की जरुरत नही पड़ती।

Client-side scripting में उपयोग होने वाले languages के उदाहरण हैं:
Client-side scripting के फायदे भी हैं जैसे:
  • यह तुरंत execute होता है क्योंकि सर्वर पर नही बल्कि यूजर के ब्राउज़र पर रन होता है।
  • सर्वर लोड को कम करता है जिससे वेबसाइट की स्पीड बढ़ जाती है।
  • वेब पेज को और अधिक इंटरैक्टिव बनाता है।
इन सबके अलावा client-side scripting के कुछ disadvantages भी हैं जैसे:
  • यह secure नही होता क्योंकि इसके कोड को कोई भी देख सकता है।
  • अलग-अलग ब्राउज़र script को अलग-अलग तरीके से सपोर्ट करते हैं।
  • अगर यूजर का ब्राउज़र पुराना है तो यह ठीक तरीके से काम नही करेगा।
Server-side scripting क्या है?
server-side scripting in Hindi

सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग एक ऐसा तरीका है जिसके जरिये हम किसी प्रोग्राम को सर्वर में चला सकते हैं। दुसरे शब्दों में कहें तो ऐसे scripts जो की वेब सर्वर में execute होते हैं, सर्वर साइड स्क्रिप्ट कहलाते हैं।

ये scripts server में स्टोर रहते हैं और तब execute होते हैं जब client की ओर से किसी task को perform करने के लिए request भेजा जाता है।

उदहारण के लिए जब आप फेसबुक पर login करने के लिए username और password enter करके login button पर click करते हैं तो आपके द्वारा डाला गया यूजरनेम और पासवर्ड सर्वर को भेजा जाता है जहाँ कोई server side script होता है वह डेटाबेस access करके यह verify करता है की आपने सही data enter किया है या नही।

गलत जानकारी होने पर यह script आपके browser को एक error message वाला web page send कर देता है। वहीँ login successful होने पर आप Facebook के home page पर चले जाते हैं।

यहाँ सबसे important बात यह है की ये program या script server पर ही execute होते हैं और execution के बाद जो भी output होता है उसे HTML page के रूप में client को भेज दिया जाता है।

आपने समाचार या मौसम की जानकारी देने वाले website या web application जरुर देखे होंगे जिनपर लगातार changes होते रहते हैं, और ऐसा सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग की मदद से ही सम्भव हो पाता है।

Server-side script बनाने के लिए कई प्रकार के programming languages उपयोग होते हैं जिनमे से कुछ common languages इस प्रकार हैं:
  • PHP
  • Java
  • Server-side JavaScript
  • Python
  • Perl
  • Ruby
अब चलिए बात करते हैं server-side scripting के advantages के बारे में:
  • इससे हम database driven website या web application बना सकते हैं।
  • इसके द्वारा dynamic content और pages बनाये जा सकते हैं।
  • इसके code server पर ही होते हैं और client को नही दिखाई देते इसलिए यह secure होता है।
  • Website admin स्क्रिप्टिंग से बने CMS (Content Management System) के जरिये अपनी वेबसाइट को बार-बार coding किये बिना आसानी से manage कर सकता है।
  • यह browser dependent नही होता इसलिए browser version की चिंता नही रहती।
  • Social media, e-commerce, यहाँ तक की railway ticket, airline reservation जैसे बड़े-बड़े complex websites सर्वर-साइड स्क्रिप्ट की वजह से ही काम कर पाते हैं।
इन benefits के अलावा server-side scripting के disavantages भी हैं जैसे:
  • यह तभी काम कर सकता है जब हम सर्वर पर scripting software install करते हैं।
  • किसी dynamic website को बनाने के लिए database जरुरी होता है।
  • यदि hosting server की speed कम है तो इसकी execution speed कम हो जाती है।
  • यदि website बहुत बड़ी हो या उस पर traffic अधिक हो तो हमें powerful और बेहतर होस्टिंग की जरुरत पड़ती है।
  • सही तरह से कोडिंग नही करने या गलतियाँ करने से वेबसाइट के हैक होने का खतरा बना रहता है।

क्लाइंट-साइड और सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग में क्या अंतर है?
Client-Side Scripting  Server-Side Scripting
यह front-end technology है।  यह back-end technology है।
यह यूजर के browser पर run होता है। यह web server पर run होता है।
इसके source code को user देख सकता है। इसके code client तक नही पहुँचते इसलिए इसे यूजर नही देख सकता।
क्लाइंट-साइड स्क्रिप्ट web server पर stored डेटाबेस से connect नही हो सकता। इसके द्वारा server पर उपलब्ध database को access किया जा सकता है।
Server के file system से किसी फाइल को यह access नही कर पाता। सर्वर पर उबलब्ध फाइल सिस्टम को यह access कर सकता है।
सर्वर-साइड की तुलना में क्लाइंट-साइड स्क्रिप्टिंग का response fast होता है। क्लाइंट-साइड की तुलना में सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग का response slow होता है।।
Client-side scripting को यूजर द्वारा ब्राउज़र की setting से block किया जा सकता है जिससे यह यूजर के ब्राउज़र पर run नही होगा। इस प्रकार के स्क्रिप्ट को यूजर block नही कर सकता।

Scripting Language का क्या उपयोग है? अलग-अलग तरीके से कई सारे जगहों पर इसका उपयोग किया जाता है जैसे:

  • Website और web applications में क्लाइंट-साइड और सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग, Javascript, jQuery, PHP, ASP आदि का उपयोग किया जाता है।
  • System-administration में भी इसका उपयोग होता है जहाँ Perl, Python, Shell scripts आदि use किया जाता है।
  • किसी software के लिए plugins या extensions बनाने के लिए भी उपयोग होता है।
  • विडियो गेम्स बनाने के लिए भी उपयोग होता है।

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उम्मीद है आपको scripting के बारे में यह जानकारी पसंद आई होगी। आप अपना सवाल या सुझाव नीचे कमेंट के माध्यम से हम जरुर पहुंचाएं।

Friday, 28 December 2018

डेटाबेस क्या है? इसका उपयोग कहाँ-कहाँ होता है?

What is database in Hindi

डेटाबेस क्या है? इसका उपयोग कौन करता है? आखिर इसकी जरुरत क्यों पड़ती है? इसके क्या फायदे हैं?

अगर आपके मन में ये सारे  सवाल आ रहें हैं तो आपको यह आर्टिकल जरुर पढना चाहिए।

कोई छोटा सा बिज़नस हो, सरकारी संस्था हो या मल्टीनेशनल कंपनी, कोई वेबसाइट हो या वेब एप्लीकेशन यहाँ तक की आप आपने मोबाइल में जो गेम खेलते हैं या कोई ऑनलाइन विडियो देखते हैं हर जगह डेटा ही डेटा हैं।

क्या आपने कभी सोचा है की इतने सारे डाटा को आखिर कहाँ रखा जाता है और उसे कैसे मैनेज किया जाता है?

ये सभी संभव हो पता है database की मदद से। आज हम इस आर्टिकल में इसी के बारे में चर्चा करने वाले हैं।
Data क्या है? डेटाबेस को समझने से पहले यह जानना जरुरी है की डेटा क्या होता है। डेटा किसी भी information का एक छोटा सा हिस्सा होता है। यह किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान जुड़ा से हुआ कोई तथ्य (fact) हो सकता है।

जैसे: आपका नाम, आपकी उम्र, ऊंचाई, वजन, मोबाइल नंबर आदि आपसे जुड़े हुए कुछ डेटा हैं।

डेटा अलग-अलग कई प्रकार के फॉर्मेट में हो सकते हैं जैसे टेक्स्ट, नंबर, इमेज, फाइल आदि।

जब इन्हीं डेटा को किसी विशेष फॉर्म में प्रोसेस किया जाता है तो वह इनफार्मेशन बन जाता है।

डेटाबेस क्या है? डेटाबेस कई सारे डेटा का एक समूह होता है। इन डेटा को डेटाबेस में एक व्यवस्थित तरीके से स्टोर किया जाता है ताकी जरुरत पड़ने पर इन्हें आसानी से access किया जा सके।

आपने Microsoft Office Excel का उपयोग किया होगा जहाँ पर हम डाटा स्टोर करने के लिए एक टेबल का उपयोग करते हैं जिसे हम अलग-अलग कई सारे कॉलम में डिवाइड करते हैं ताकि हमारा काम आसान हो सके।

ठीक इसी तरह डेटाबेस में भी डेटा को एक table में स्टोर किया जाता है जिसमे कई सारे columns और rows होते हैं जिनकी वजह से उन्हें access करना आसान हो जाता है।

एक डेटाबेस के अंदर ऐसे कई सारे tables हो सकते हैं।

इन्टरनेट पर मौजूद ऐसे कई सारे dynamic websites हैं जो database का उपयोग करते हैं।

उदाहरण के लिए आप फेसबुक को ही ले लीजिये, जिसपर यूजर के बारे में कई सारे data जैसे उनका नाम, मोबाइल नंबर, profile pictures, friends, messages, posts, status आदि सभी details सर्वर में उपस्थित database में ही स्टोर रहते हैं।

ठीक इसी तरह ई-कॉमर्स वेबसाइट जैसे Flipkart, Amazon आदि की हम बात करें तो वहां पर भी इसका उपयोग होता है। कस्टमर की जानकारी, product detail से लेकर हर एक जानकारी डेटाबेस में ही stored रहते हैं।

डेटाबेस में Field, Record, और Table क्या होते हैं? किसी डेटाबेस के मुख्यतः तीन elements होते हैं:
  1. Field
  2. Record
  3. Table
Field: किसी डेटाबेस टेबल में Fields को columns में दर्शाया जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो आप टेबल के कॉलम को फील्ड कह सकते हैं।

Example के लिए आप नीचे दिया गया student table देखें जिसमे Sid, Name, Class, Subject और Marks नाम के 5 fields हैं:
database table field example

Record: किसी टेबल के rows को हम records कह सकते हैं। उदाहरण के लिए नीचे दिया गया टेबल देखें जहाँ 4 records दिए गये हैं।
database-record

Table: Fields और Records से मिलकर एक complete table बनता है। इस टेबल पर कई सारे अलग-अलग लेकिन एक दुसरे से सम्बंधित data enter किये जाते हैं।

database table example

डेटाबेस का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? इसके कई सारे examples हो सकते हैं और सभी के बारे में बता पाना काफी मुश्किल काम है। हम नीचे कुछ उदाहरण दे जहाँ पर डेटाबेस का उपयोग होता है:

ऑनलाइन विडियो स्ट्रीमिंग: चाहे आप Youtube पर विडियो देखते हों या Netflix पर अपनी मनपसंद वेब सीरीज देखते हों हर विडियो स्ट्रीमिंग साईट अपने डाटा को मैनेज करने के लिए डेटाबेस का उपयोग करता है जहाँ पर विडियो के details से लेकर देखने वाले users का भी जानकारी स्टोर होती है।

ऑनलाइन गेमिंग: क्या आपने PUBG गेम खेला है? अगर हाँ तो आपने देखा होगा की एक साथ कई millions user गेम खेल रहे होते हैं, क्या आपने सोचा है की इतने सारे users और उनके नाम से लेकर उनकी गेमिंग हिस्ट्री कैसे मैनेज की जाती होगी? जाहिर सी बात है यहाँ भी डेटाबेस का उपयोग हो रहा है और इसके बिना यह संभव नही है।
शेयर मार्केट: स्टॉक मार्केट में सैकड़ों कम्पनियाँ रजिस्टर्ड हैं और इनके शेयर हर सेकंड में ऊपर-नीचे होते रहते हैं। यहाँ हर दिन अरबों रूपए से भी ज्यादा के लेन-देन होते हैं। इन सबके हिसाब कहाँ रहते होंगे? यहाँ भी डेटाबेस के बिना काम नही चलने वाला।

आधार कार्ड: आपने भी आधार कार्ड बनवाया ही होगा इस दौरान आपका नाम, जन्म तिथि, माता-पिता का नाम, यहाँ तक की आपकी उँगलियों के निशान से लेकर आपके आँखों की रेटिना के निशान जैसे हर प्रकार की जानकारियां आपको देनी पड़ी होंगी। आपको क्या लगता है ये सारी जानकारियां कहाँ और कैसे रखी गयी होंगी। यहाँ भी डेटाबेस की जरुरत पडती है।

रेलवे रिजर्वेशन सिस्टम: टिकट बुकिंग से लेकर ट्रेन की लाइव स्टेटस की जानकारी किसी डेटाबेस में ही रखे जाते हैं।

फ्लाइट रिजर्वेशन: रेलवे की तरह यहाँ भी फ्लाइट की हर एक जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए DB की जरुरत पड़ती है।

बैंकिंग: हम रोजाना बैंकों के माध्यम से हजारों लेन-देन करते हैं और हम बिना बैंक जाए केवल एक मोबाइल एप्प से ऐसा कर सकते हैं। तो कैसे बैंकिंग इतनी आसान हो गई है कि हम घर बैठे पैसा भेज या प्राप्त कर सकते हैं। यह सब डेटाबेस की वजह से ही संभव है जो सभी बैंक लेनदेन का मैनेजमेंट करता है।

सोशल मीडिया: हम सभी फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस जैसे सोशल मीडिया वेबसाइट पर हैं ताकि हम अपने विचारों को साझा कर सकें और अपने दोस्तों के साथ जुड़ सकें। इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लाखों उपयोगकर्ताओं ने साइन अप किया है। लेकिन उपयोगकर्ताओं की सभी जानकारीयां कैसे संग्रहीत की जाती है और हम अन्य लोगों से कैसे जुड़ पाते हैं, हाँ यह भी database का ही कमाल है।

ऑनलाइन शौपिंग वेबसाइट: इसका उदहारण तो हमने ऊपर ही दे दिया है। आप किसी ई-कॉमर्स साईट से कुछ भी खरीदें उसकी जानकारी सालों-साल तक सुरक्षित रहती है जिसे आप अपनी शौपिंग हिस्ट्री में कभी भी देख सकते हैं।

कॉलेज/ यूनिवर्सिटीज: स्टूडेंट से लेकर कर्मचारियों की हर एक जानकारियाँ डेटाबेस में ही रखे जाते हैं क्योंकि यह आसान और सुरक्षित है।

लाइब्रेरी मैनेजमेंट सिस्टम:  मेम्बरशिप डिटेल, किसने कौन सी बुक पढ़ी, किताबों की जानकारियाँ जैसी हर एक डाटा महत्वपूर्ण है जिन्हें DB पर सुरक्षित रखा जाता है।

हॉस्पिटल मैनेजमेंट सिस्टम: हॉस्पिटल के डॉक्टर्स और अन्य स्टाफ से लेकर मरीज और उनकी बिमारियों से जुड़े डाटा भी कहीं न कहीं सहेज कर रखे जाते हैं।

टेलीकम्यूनिकेशन: कोई भी दूरसंचार कंपनी बिना डेटाबेस सिस्टम के अपने व्यवसाय के बारे में सोच भी नहीं सकता। इन कंपनियों को कॉल डिटेल और मासिक बिल जैसी हर एक जानकारियां अपने पास रखनी होतीं हैं।
इन सबके अलावा और भी कई सारे जगह हो सकते हैं जहाँ database का उपयोग होता है। यदि आपको पता है तो हमें कमेंट करके जरुर बताएं।

डेटाबेस के क्या फायदे हैं?
चलिए अब जानते हैं की डेटाबेस का उपयोग क्यों करना चाहिए और इसके क्या फायदे हो सकते हैं:
  • डेटाबेस के जरिये कम स्पेस में भी ज्यादा डेटा स्टोर किया जा सकता है।
  • किसी भी जानकारी को आसानी से access किया जा सकता है।
  • नये data को insert करना, पुराने डेटा को edit करना और delete करना आसान है।
  • data को filter करना आसान है।
  • डाटा को अलग-अलग प्रकार से sort किया जा सकता है।
  • एक ही डेटाबेस को कई सारे applications या users एक साथ access कर सकते हैं।
  • किसी डेटाबेस टेबल से डाटा को import या export करना बहुत आसान है।
  • पेपर फाइल्स की तुलना में अधिक security provide करता है।
  • Redundancy को कम करता है।
  • Program और data को एक दुसरे से अलग रखता है।
  • बैकअप और रिकवरी जैसी सुविधाएँ प्रदान करता है।
DBMS (Database Management System) क्या है?
आपने यह तो समझ लिया की डेटाबेस क्या होता है और इसके क्या-क्या फायदे हैं लेकिन एक डेटाबेस काम कैसे करता है यह समझने के लिए आपको DBMS के बारे में जानना होगा।  

आपके मन में यह सवाल जरुर आ रहा होगा की डेटाबेस में डेटा कैसे स्टोर किया जाता होगा, उसे edit, update या delete कैसे किया जाता होगा?

दरअसल इस काम के लिए हमें एक सॉफ्टवेर के जरुरत पड़ती है जिसके जरिये हम database create कर सकते हैं उसको access करके उस पर कई प्रकार के operations perform कर सकते हैं।

डेटाबेस को manage करने के लिए ऐसे कई सारे software/programs होते हैं और इन्हें ही database management systems (DBMS) कहा जाता है।

DBMS एक interface provide करता है जिसके जरिये हम कई सारे काम कर पाते हैं जैसे:
  • Database create करना 
  • Table create करना 
  • Table में data insert करना 
  • Data retrive करना यानि access करना 
  • पहले से stored डाटा को update करना
  • डेटा delete करना आदि
इन सबके अलावा DBMS का काम data को secure रखना भी होता है ताकि unauthorized person उसे access न सके।

वैसे तो DBMS software कई सारे होते हैं लेकिन उनमे से सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले program कुछ इस प्रकार हैं:
  • MySql  
  • Oracle 
  • SQL Server 
  • IBM DB2 
  • PostgreSQL 
  • SimpleDB
Database management के लिए इन सब के अलावा और भी कई सारे options हैं। कई सारे organizations तो ऐसे भी हैं जो अपने जरुरत के अनुसार खुद का सॉफ्टवेर बना कर उपयोग करते हैं।


SQL क्या है?
SQL का full form Structured Query Language है। इसके S-Q-L या कभी-कभी See-Quel भी पढ़ा जाता है। यह एक प्रकार का लैंग्वेज है जिसका उपयोग database management में किया जाता है।

इस query language के जरिये ही डेटाबेस पर create, insert, search, update, delete जैसे operation perform किये जाते हैं।

जिस प्रकार से किसी programming language का syntax होता वैसे ही इसके भी syntax और rules होते हैं।

उदहारण के लिए हमारे पास student नाम का कोई टेबल है और हम ऐसे students का नाम देखना चाहते हैं जिनकी उम्र 20 साल से कम हो तब इसका syntax कुछ इस प्रकार होगा:

SELECT name From students WHERE age < 20

जहाँ पर "name" एक कॉलम का नाम है और "students" एक टेबल का नाम है।

ऐसे ही हर प्रकार के operation के लिए SQL में अलग-अलग code निर्धारित किये गये हैं।

सारांश 

  • डेटाबेस एक ऐसा फाइल है जहाँ कई सारे डेटा को एक व्यवस्थित तरीके रखा जाता है।
  • डेटा को tables पर रखा जाता है और एक डेटाबेस में कई सारे tables हो सकते हैं।
  • DBMS का full form "Database Management Systems" है।
  • डीबीएमएस एक प्रकार का software/program या tool होता है जिसके जरिये database को manage किया जाता है।
  • MySql, SQL Server, Oracle आदि डीबीएमएस सॉफ्टवेयर के कुछ उदाहरण हैं। 
  • SQL का full form "Structured Query Language" है।
  • इस language के माध्यम से कुछ कोड लिखे जाते हैं और डेटाबेस में insert, update, delete जैसे operations perform किये जाते हैं।


Saturday, 22 December 2018

वेबसाइट क्या है? Static और Dynamic Website में क्या अंतर है?

website kya hai - what is website in Hindi
वेबसाइट क्या है? भले ही आज हम इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे हों, लेकिन हम इस बात से इनकार नही कर सकते की हम हर दिन किसी न किसी रूप में वेबसाइट का उपयोग कर रहे हैं।

हम इन्टरनेट पर हर रोज फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट्स पर समय बिताते हैं, किसी प्रकार की जानकारी चाहिए हो तो हम गूगल पर जाते हैं, और विडियो देखना हो तो उसके लिए Youtube तो मौजूद है ही।

ये सारी चीजें अलग-अलग प्रकार की वेबसाइट हैं और हम हर दिन अपने कंप्यूटर पर या मोबाइल पर कोई न कोई वेबसाइट उपयोग कर रहे होते हैं।

आज हम वेबसाइट के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे और जानेंगे की आखिर वेबसाइट होता क्या है? इसके क्या फायदे हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? static और dynamic site में क्या अंतर है? इसके अलावा जानेंगे की वेबसाइट कैसे बनाया जाता है।
वेबसाइट क्या है? What is Website in Hindi? वेबसाइट या साईट कई सारे web pages का एक collection होता है। एक वेबसाइट में कई सारे वेब पेज होते हैं और हर एक पेज में अलग-अलग प्रकार की जानकारियाँ होती है

web page दरअसल एक प्रकार का document होता है जिसपर टेक्स्ट, इमेज, विडियो आदि हो सकते हैं। ये सभी pages वेब सर्वर पर मौजूद होते हैं।

वेबसाइट के मुख्य पेज को होम पेज कहा जाता है जहाँ पर कई सारे लिंक दिए गये होते हैं जिनपर क्लिक करके हम इन web pages को ओपन कर सकते हैं।

हर वेबसाइट का एक unique वेब एड्रेस होता है जिसे URL कहा जाता है और उसी URL यानि एड्रेस के जरिये ही उस वेबसाइट तक पहुँचा जाता है।

जैसे हमारी वेबसाइट का एड्रेस webinhindi.com है और इसी एड्रेस के जरिये आप हमारी वेबसाइट को देख पा रहे हैं।

किसी भी वेबसाइट को ओपन करने के लिए एक प्रकार का सॉफ्टवेयर या एप्लीकेशन की जरूरत पड़ती है जिसे ब्राउज़र कहा जाता है। Chrome, Firefox, Opera, UC browser आदि ब्राउज़र के उदाहरण हैं।

यह भी पढ़ें:

Static वेब साईट और Dynamic वेबसाइट क्या हैं? दोनों में क्या अंतर है? वेबसाइट मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:
  1. Static website
  2. Dynamic website
Static website क्या होता है? यह समझाने के लिए नीचे कुछ बिंदु दिए गये हैं:
  • यह simple HTML से कोडिंग करके बनाया जाता है।
  • इसे बनाना बहुत ही आसान है।
  • इसको बनाने में समय कम लगता है।
  • अगर लागत की बात करें तो यह बहुत ही सस्ता होता है।
  • यह किसी भी प्रकार के डेटाबेस से कनेक्ट नही होता।
  • इसके content static होते हैं यानी ये अपनेआप update नही होते।
  • साईट को update करने के लिए coding करना जरुरी है।
  • जब तक आप इसके कोड में changes नही करेंगे तब तक इसके कंटेंट में बदलाव नही होगा।
Static वेबसाइट का उदाहरण: ज्यादातर कॉलेज या स्कूल की वेबसाइट static होती है। लेकिन कुछ pages dynamic भी हो सकते हैं जैसे एडमिशन फॉर्म, कांटेक्ट फॉर्म आदि।

अब चलिए समझते हैं की Dynamic website क्या होता है:
  • इसे बनाने में समय अधिक लगता है।
  • लागत अधिक लगता है।
  • इसमें अधिक से अधिक फंक्शन जोड़े जा सकते हैं।
  • इसमें PHP, ASP.Net, JavaScript, Python आदि technologies का उपयोग किया जाता है।
  • वेबसाइट को डेटाबेस से कनेक्ट किया जाता है।
  • हर कंटेंट के लिए कोडिंग करनी नही पडती।
  • कंटेंट डेटाबेस में स्टोर रहता है और वहां से निकाल कर यूजर को दिखाया जाता है।
  • एडमिन के लिए एक अगल interface/पेज बनाया जाता है जहाँ से साईट आसानी से बिना कोड लिखे अपडेट किया जा सकता है।
Dynamic website का example: ऑनलाइन शौपिंग की साईट, सर्च इंजन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन video streaming जैसी वेबसाइट dynamic होती है।

यह भी पढ़ें:
कोई वेबसाइट static है या dynamic कैसे पता लगायें?
ऊपर हमने static और dynamic website दोनों की पहचान बता दी है लेकिन इसके बावजूद किसी साईट को देख कर यह पता लगाना काफी मुश्किल होता है की वह स्टैटिक है या डायनामिक क्योंकि आजकल लगभग हर साईट में कुछ न कुछ dynamic content होते ही हैं।

इस काम के लिए आप builtwith या wappalyzer जैसे ब्राउज़र extension का उपयोग कर सकते हैं जो की साईट में उपयोग होने वाले technologies के बारे में आपको सटीक जानकारी दे सकते हैं।

वेबसाइट कितने प्रकार के होते हैं? (Website Categories) इन्टरनेट पर कई प्रकार के वेबसाइट मौजूद हैं और हम अपने जरुरत के हिसाब से उनका उपयोग करते हैं। हमने नीचे website categories की लिस्ट बनाने की कोशिश की है जिससे की आप समझ सकते हैं की वेबसाइट कितने प्रकार के हो सकते हैं:
  • न्यूज़-मैगज़ीन की वेबसाइट 
  • सोशल मीडिया 
  • ई-कॉमर्स 
  • ब्लॉग
  • पोर्टल
  • फोरम
  • विडियो स्ट्रीमिंग 
  • गेमिंग वेबसाइट
  • विकी साइट्स
  • जॉब बोर्ड
  • डायरेक्टरी
  • फोटोग्राफी 
  • स्कूल-कॉलेज की साईट
  • गवर्नमेंट वेबसाइट 
  • कूपन वेबसाइट
  • पॉडकास्ट वेबसाइट
  • पोर्टफोलियो वेबसाइट
  • बिज़नस वेबसाइट
  • पर्सनल वेबसाइट
जरुरी नही है की वेबसाइट के सिर्फ इतने ही प्रकार हों इन सबके अलावा और भी कई सारे categories हो सकते हैं। यदि आपको पता हो तो हमें नीचे कमेंट करके बता सकते हैं।

यह भी पढ़ें: डिजिटल मार्केटिंग क्या है? कितने प्रकार के होते हैं? 

वेब पेज, वेबसाइट, वेब पोर्टल और फोरम में क्या अंतर है? वेब पेज: World Wide Web (WWW) पर उपस्थित कोई एक single file वेबपेज कहलाता है। हम किसी वेबसाइट के एक सिंगल पेज को वेब पेज कह सकते हैं।

वेबसाइट: यह कई सारे web pages से मिलकर बना होता है।

वेब पोर्टल: यह वेबसाइट जैसी ही होती है लेकिन इसके कंटेंट प्राइवेट होते हैं और जब तक user name और password के जरिये login न किया जाय उसे देखा नही जा सकता। इसके लिए नेट बैंकिंग की साईट एक अच्छा उदाहरण है अगर आप इसका उपयोग करते हैं तो आपने देखा ही होगा उस वेबसाइट में बिना लॉग इन किये आप अपने खाते की जानकारी हासिल नही कर सकते हैं।

फोरम: यह एक पकार की वेबसाइट है जहाँ लोग अलग-अलग विषय पर चर्चा करते हैं करते हैं। यह सोशल मीडिया पर चैटिंग करने जैसा नही है, यहाँ पर आप अपने सवाल और परेशानियों को रख सकते हैं और फोरम के दुसरे सदस्य उन सवालों का जवाब विस्तार से देते हैं।

वेबसाइट के क्या फायदे हैं? इन्टरनेट पर आपकी पहचान बनाता है: 
आजकल हर किसी के पास इन्टरनेट की सुविधा है और लोग किसी चीज के बारे में जानने के लिए उसे सबसे पहले इन्टरनेट पर ही सर्च करना पसंद करते हैं क्योंकि यह बहुत आसान है और इन्टरनेट के पास जानकारियों का भंडार है। ऐसे में यदि आप अपनी या अपने बिज़नस की पहचान बनाना चाहते हैं तो अपनी जानकारियाँ आपको इन्टरनेट पर डालनी ही पड़ेंगीं और इसके लिए वेबसाइट एक बेहतर विकल्प है।

हमेशा 24/7 उपलब्ध रहता है:
एक वेबसाइट इन्टरनेट पर 24 घंटे और साल के पूरे दिन सक्रीय रहता है। ग्राहक आपको कभी भी, कहीं भी ढूंढ सकते हैं। यहां तक कि छुट्टी के समय भी आपकी वेबसाइट नए ग्राहकों को ढूंढने और आपके ब्रांड का प्रचार करने के लिए लगातार काम करता रहता है। यह उपयोगकर्ता को सुविधा प्रदान करता है जिससे वे अपने घर में आराम से बैठ कर आवश्यक जानकारी पा सकते हैं।

पूरी दुनिया में अपनी पहुँच बनायीं जा सकती है: 
चाहे आप उत्पाद बेचते हों या किसी प्रकार की सेवाएं प्रदान करते हों, एक ऑनलाइन वेबसाइट उन्हें बेचने का एक बेहतरीन स्थान है। आप केवल एक वेबसाइट के जरिए उन ग्राहकों तक पहुंच सकते हैं जो किसी अन्य शहर या देश में हैं। हमारे व्यस्त जीवन शैली में ऑनलाइन ब्राउज़ करना ज्यादा सुविधाजनक है - अब वे दिन चले गये जब हम दुकानों में प्रोडक्ट की जांच करने और खरीदने में घंटों खर्च किया करते थे। एक वेबसाइट इस प्रोसेस को कई गुना तेज कर देता है।

पैसे की बचत होती है:
क्या आपने कभी प्रिंट मीडिया, रेडियो, टेलीविजन या अन्य माध्यमों से अपने व्यापार का विज्ञापन किया है? अगर हाँ तो आपको पता होगा की यह बहुत महंगा है, लेकिन किसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विज्ञापन में निवेश करना आवश्यक है, लेकिन इसमें बहुत पैसा लगता है और छोटे व्यापारियों के लिए लगभग नामुमकिन जैसा है। लेकिन एक वेबसाइट होने से आपकी कंपनी को कम खर्च में अधिक बढ़ावा मिलेगा।

विज्ञापन और मार्केटिंग का बेहतरीन साधन है:
जब विज्ञापन और मार्केटिंग की बात आती है तो इस काम में भी एक वेबसाइट बखूबी आपकी मदद करता है। इंटरनेट के माध्यम से अपने उत्पादों या सेवाओं का विज्ञापन करने के कई सारे तरीके हैं। Google AdWords जैसे टूल या Facebook Ads किसी पारंपरिक ऑफ़लाइन विज्ञापन की तुलना में अधिक सटीकता और विश्वसनीयता के साथ काम करते हैं। इसके अलावा search engine optimization (SEO) की सहायता से सर्च इंजन पर आपकी वेबसाइट की रैंकिंग को बढ़ावा मिलता है जिससे साईट पर अधिक से अधिक लोग पहुँच पाते हैं।

लोगों को आपकी जानकारी देता है:
एक बिज़नस वेबसाइट आपकी कंपनी और सेवाओं के बारे में आपके ग्राहकों को सटीक जानकारी प्रदान करने के लिए एक बेहतरीन विकल्प है। कुछ कम्पनी अपनी साईट पर केवल बुनियादी जानकारियाँ, पता और फोन नंबर डालते हैं। जबकि कई लोग testimonial, तस्वीरें, विडियो और अन्य विस्तृत जानकारियाँ जोड़ते हैं, जो की आपकी कंपनी के प्रति लोगों के अंदर एक विश्वास पैदा करती है। एक अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई वेबसाइट उपयोगकर्ता को उस उत्पाद या सेवा की जानकारी बड़ी आसानी से उपलब्ध कराता है। इसके अलावा इन जानकारियों को समय के साथ पूरी तरह से updated रखना बहुत ही आसान है।

अपने Skill set को पूरी दुनिया को दिखाने में मदद करता है: 
चाहे आप किसी भी प्रकार के उद्योग में हों, एक वेबसाइट आपके काम को प्रदर्शित करने का एक शानदार तरीका है। आप online portfolio, image gallery और customer feedback का बखूबी उपयोग करके पूरी दुनिया में अपनी कार्य कुशलता को साबित कर सकते हैं। आप दिखा सकते हैं कि आपका व्यवसाय कितना बेहतर है और आपके ग्राहक आपके काम से कितने संतुष्ट हैं।

बिजनेस के लिए ग्राहक बढाने में सहायता करता है:
आपने देखा होगा की कई लोगों का व्यवसाय स्थानीय स्तर पर बहुत लोकप्रियता होता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की यदि उनके बारे में शहर के बाहर संभावित ग्राहकों को पता चले तो उन्हें कितना ज्यादा फायदा होगा? और यह काम एक वेबसाइट बखूबी कर सकता है। यह न सिर्फ आपके शहर के बाहर, बल्कि दुनिया भर में अधिक से अधिक ग्राहक बनाने में आपकी मदद कर सकती है। यह आपके व्यवसाय को विश्व स्तरीय बना सकता है। एक वेबसाइट के साथ आपका व्यवसाय दुनिया भर में दिखाई देगा।

ग्राहकों से बेहतर सम्बन्ध बनाने में मदद करता है:
अपने व्यवसाय को ऑनलाइन लेकर आने का एक अन्य कारण यह है कि आप कहीं भी और कभी भी अपने ग्राहकों से बातचीत कर सकते हैं। अपने ग्राहकों से जुड़े रहने के लिए आप न्यूज़ अपडेट, लाइव चैट, ईमेल मेसेज या कमेंट सिस्टम का उपयोग कर सकते हैं। वहीँ ग्राहक आपके प्रोडक्ट और सेवाओं का फीडबैक आपके वेबसाइट पर ही दे सकता है जिससे की आप किसी भी पल उनकी समस्याओं को सुलझाने और सलाह देने के लिए उपलब्ध रहेंगे।

यह भी पढ़ें: डिजिटल मार्केटिंग क्या है? कितने प्रकार के होते हैं?

वेबसाइट कैसे बनाया जाता है?
वेबसाइट बनाने के कई सारे तरीके हैं, आप कौनसा method उपयोग में लेंगे यह निर्भर करता है की आप किस तरह का वेबसाइट बना रहे हैं। कुछ तरीके में आपको coding करनी पड़ती है तो कुछ ऐसे भी method होते हैं जहाँ आप बिना कोई कोड लिखे कुछ टूल्स की मदद से वेबसाइट तैयार कर सकते हैं।

चलिए इन तरीकों के बारे में बात करते हैं:

1. खुद से कोडिंग करके वेबसाइट बनाना: इस तरीके में आपको हर एक चीज खुद से बनानी होगी, जाहिर सी बात है इसकेलिए आपको HTML, CSS, Javascript, PHP आदि में coding करना सीखना पड़ेगा। इस तरीके से यदि साईट तैयार किया जाय तो इसमें काफी समय लग सकता है। लेकिन इसमें फायदा यह है आप हर एक चीज
अपनी पसंद के अनुसार बना सकते हैं और आपके वेबसाइट के हर एक element पर आपका control रहेगा।

2. Themes और CMS के जरिये वेबसाइट बनाना: CMS यानि Content Management System जैसे Wordpress, Joomla, Drupal आदि का उपयोग करना पहले तरीके के मुकाबले काफी आसान है। इसमें आपको कोड लिखने की जरुरत नही पड़ती बस CMS या framework को सर्वर पर install करना होता है और फिर अपनी मनपसंद theme चुनकर साईट तैयार कर सकते हैं। हाँ यदि आप और अधिक customization चाहते तो इसके लिए आप कोड एडिट भी कर सकते हैं।

3. Website builder से वेबसाइट बनाना: इन्टरनेट पर आपको ऐसे कई सारे टूल्स मिल जायेंगे जो आपके काम को कई गुना आसान बना देते हैं। जैसे Wix, Weebly, Squarespace आदि। कुछ वेबसाइट बिल्डर ऑफलाइन भी काम करते हैं जैसे Mobirise, TemplateToster आदि। इन software की खासियत यह है की आपको किसी भी प्रकार की कोडिंग करने की जरुरत नही पड़ती है बल्कि आप dran and drop करके बड़ी आसानी सेडिजाईन बना सकते हैं।

4. किसी प्रोफेशनल के जरिये वेबसाइट बनवाना: यदि आपके पास समय की कमी है और यह काम खुद से नही करना चाहते हैं तो सबसे बढिया तरीका है की आप किसी प्रोफेशनल वेब डिज़ाइनर से यह काम करवा लें। इसमें आपके समय की बचत तो होगी ही इसके अलावा कुछ परेशानी आने पर आपको एक support भी मिलेगा।

आगे पढ़ें:


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Monday, 10 December 2018

ब्लॉग क्या है? लोग blogging क्यों करते हैं? इसके क्या फायदे हैं?

blog kya hai

ब्लॉग क्या है? इस सवाल का जवाब जानने से पहले चलिए इससे जुड़े कुछ दिलचस्प आंकड़ों के बारे में बात करते हैं:

Statista के अनुसार अक्टूबर 2011 तक दुनियाभर में लगभग 17 करोड़ 30 लाख blogs बनाये जा चुके थे

अब एक अनुमान के मुताबिक पूरे इन्टरनेट पर मौजूद blogs की संख्या 44 करोड़ से भी ज्यादा हो चुकी है

इन ब्लोग्स पर हर महीने लगभग 70 करोड़ से भी ज्यादा पोस्ट लिखे जाते हैं

हर महीने हम और आप जैसे लगभग 40 करोड़ से भी ज्यादा लोग इन ब्लोग्स को पढ़ते हैं, भले ही हमे इस बात की जानकारी न हो।

इन आंकड़ों से यह तो साबित होता है की आज इन्टरनेट की दुनिया में ब्लॉगिंग कितना महत्वपूर्ण है। अगर आप blogging के बारे में और आधिक जानकारी चाहते हैं तो इस आर्टिकल को जरूर पढ़ें।

ब्लॉग क्या है? ब्लॉग या वेबलॉग एक प्रकार का वेबसाइट है जिसे लोग एक डायरी की तरह उपयोग करते हैं इसपर वे अपना अनुभव, अपने विचार और जानकारियाँ टेक्स्ट, इमेज, विडियो आदि के माध्यम से लोगों के साथ साझा करते हैं।

ब्लॉग के कंटेंट को ब्लॉग पोस्ट कहा जाता है। और एक ब्लॉग में कई सारे ब्लॉग पोस्ट हो सकते हैं।

ब्लॉग पोस्ट को अपडेट करने की तिथि के अनुसार एक क्रम में दिखाया जाता है, इसमें नये पोस्ट पहले और पुराने पोस्ट बाद में दिखाए जाते हैं।

ब्लॉग को प्राइवेट भी रखा जा सकता है ताकि दूसरे लोग उसे देख न सकें। लेकिन इन्टरनेट पर मौजूद ज्यादातर ब्लोग्स सार्वजानिक होते हैं जिन्हें कोई भी पढ़ सकता है।

एक ब्लॉग को कोई एक व्यक्ति या एक टीम द्वारा चलाया जाता है।

अब तो बड़े-बड़े कॉर्पोरेट ब्लोगिंग की दुनिया में कदम रख चुके हैं और वे अपने ब्लॉग पर ढेर सारे कंटेंट शेयर करते हैं और इस काम के लिए वे कई लोगों की एक पूरी टीम रखते हैं।

ब्लॉग पोस्ट को सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस आदि पर शेयर किया जा सकता है।

ज्यादातर ब्लॉग में हर आर्टिकल (पोस्ट) के नीचे एक कमेंट सेक्शन होता है जिसमे कोई भी व्यक्ति उस कंटेंट के बारे में अपनी राय रख सकता है।

अब तो ब्लॉग्गिंग को एक बिज़नस की तरह देखा जाता है और लोग इसमें करियर भी बनाने लगे हैं।

ब्लॉग्गिंग का इतिहास सन 1994: Justin Hall नाम के एक अमेरिकन छात्र ने दुनिया का पहला ब्लॉग links.net बनाया जिसपर वे अपनी निजी जिंदगी से जुडी बातें लिखा करते थे इसे वे एक डायरी के रूप में उपयोग करते थे।

सन 1997: पहली बार "weblog " शब्द का उपयोग Jorn Barger ने किया जो की Robot Wisdom नाम के ब्लॉग के एडिटर थे।

सन 1998: एक कंप्यूटर प्रोग्रामर और वेबसाईट डेवलपर Bruce Ableson ने Open Diary बनाया। जिसपर यूजर डायरी लिख सकता था जिसपर प्राइवेसी सेटिंग के साथ पहला कमेंट सिस्टम भी जोड़ा गया था।

सन 1999: Peter Merholz ने weblog शब्द को और छोटा करके blog कर दिया और यहीं से ब्लॉग शब्द की शुरुआत हुई। इसी साल Pyra Labs ने पहला ब्लॉग प्लेटफार्म Blogger बनाया जिस लोग बिना कोडिंग किये ब्लॉग लिख सकते थे।

सन 2003: गूगल ने Blogger और Adsense को खरीद लिया। ठीक इसी साल Matt Mullenweg ने Wordpress को लांच किया।

सन 2007: Tumblr लांच हुआ जिसने मिक्रोब्लोग्गिंग के कांसेप्ट को जन्म दिया। अब लोग सिर्फ टेक्स्ट नही बल्कि इमेज, विडियो, GIFs आदि भी शेयर कर सकते थे। यहाँ तक की लोग SMS और ईमेल से भी पोस्ट पब्लिश कर सकते थे। यह दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढने वाली सोशल प्लेटफार्म थी जिसे बाद में Yahoo ने 2013 में 1.1 बिलियन डॉलर में खरीद लिया।

सन 2007 से अब तक: अब ब्लोगिंग का दायरा बढ़ गया है यह एक डायरी से निकल कर लगभग हर बिज़नस का एक जरुरी हिस्सा सा बन गया है। अब फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप और इन्स्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म हैं जिन्हें ब्लॉग से जोड़कर अधिक से अधिक लोगों तक पहुचाया जा सकता है।

लोग blogging क्यों करते हैं? ब्लॉग बनाने के क्या फायदे हैं? ब्लॉग बनाने के कई सारे फायदे होते हैं और अलग-अलग लोग अपने अलग-अलग फायदों के लिए ब्लॉग्गिंग करते हैं। कई लोगों का उद्देश्य इससे पैसे कमाना होता है तो कई लोग दूसरों की मदद करने के लिए ब्लॉग की शुरुआत करते हैं।

 ब्लॉग के फायदे अनेक हैं और लोगों के ब्लॉग बनाने के पीछे कई सारे उद्देश्य हो सकते हैं जैसे:
  • अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए 
  • अपनी जानकारियों को साझा करने के लिए 
  • ऑनलाइन पोर्टफोलियो बना कर नया नौकरी पाने के लिए
  • ऑनलाइन पैसे कमाने के लिए 
  • नाम कमाने के लिए 
  • बिज़नस को आगे बढ़ाने के लिए
  • अपने क्षेत्र में महारत हासिल करने के लिए
  • यह आपको एक बेहतर लेखक बनाता है 
  • नेटवर्क बनाने के लिए 
  • दूसरों की मदद करने के लिए
  • दूसरों से सीखने के लिए
इसके सभी के अलावा ब्लॉग्गिंग के और क्या फायदे हो सकते हैं यदि आपको पता हो तो नीचे कमेन्ट करके जरुर बताएं।

Bloggers किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं? ब्लॉग बनाने वाले और उसपर लिखने वाले को ब्लॉगर कहा जाता है। एक ब्लॉग को एक या एक से अधिक व्यक्ति भी चला सकते हैं।

ब्लॉगर कई प्रकार के होते हैं जिनको हमने मुख्यतः चार भागों में बाँटा है:

1. शौकिया ब्लॉगर:
ऐसे लोग जो अपने ब्लॉग पर अपनी हॉबी से जुडी जानकारियाँ शेयर करते हैं, शौकिया ब्लॉगर कहलाते हैं।

वे उस विषय पर बाते करते हैं जिस पर उनकी दिलचस्पी होती है। एक अच्छा हॉबी ब्लॉगर अपने कंटेंट और उसकी क्वालिटी पर ज्यादा ध्यान देता है न की पैसे पर। 

इस प्रकार की ब्लॉग्गिंग की खासियत यह है की लोग अपने ब्लॉग से ज्यादा समय तक जुड़े रहते हैं और ब्लॉग से पैसे नही मिलने पर भी निराश नही होते हैं क्योंकि वे अपने पसंदीदा विषय पर लिख रहे होते हैं।

2. पार्ट टाइम ब्लॉगर:  
नौकरी करने वाले लोग, कॉलेज या स्कूल जाने वाले छात्र भी अपने खाली समय में ब्लॉग्गिंग कर सकते हैं। 

इसका फायदा यह है की समय का सदुपयोग हो जाता है और बदले में कुछ पैसे भी मिल जाते हैं। हालांकि शुरुआत में ब्लॉग से पैसे कमाना आसान नही होता इसके लिए आपको काफी समय लगेंगे। 

लेकिन यदि आपको तुरंत पैसे चाहिए तो आप अपने खाली समय में किसी दुसरे ब्लॉगर के लिए आर्टिकल लिखकर भी पैसे कमा सकते हैं।

3. फुल टाइम ब्लॉगर: 
यकीन मानिए कई लोग ऐसे भी हैं जिनकी आमदनी का मुख्य साधन ब्लॉग होता है। ऐसे  लोग अपना पूरा समय ब्लॉग्गिंग में लगाते हैं और अपने ऑडियंस के लिए लगातार क्वालिटी कंटेट बनाते रहते हैं।

उनकी साईट पर धीरे-धीरे ट्रैफिक बढ़ता जाता है और फिर वे विज्ञापनों और अलग-अलग तरीकों से पैसे कमाते हैं।

4. प्रोफेशनल ब्लॉगर: 
ये भी फुल टाइम ब्लॉगर होते हैं लेकिन ये किसी कॉर्पोरेट या संस्था के लिए काम करते हैं और इनका मुख्य काम ब्रांड को प्रमोट करना और बिज़नस के लिए नये कस्टमर या क्लाइंट्स लाना होता है।

वे ज्यादातर कंपनी के प्रोडक्ट या सर्विस से जुडी जानकारियां अपने ब्लॉग पर लिखते हैं और उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

एक ब्लॉगर का काम क्या होता है? एक ब्लॉगर को अपने ब्लॉग को सफलतापूर्वक चलाने के लिए सिर्फ आर्टिकल लिखना नही होता बल्कि और भी कई सारे काम करने होते हैं जैसे:
  • ब्लॉग के लिए योजना बनाना और लक्ष्य निर्धारित करना
  • आर्टिकल के लिए रिसर्च करना 
  • ब्लॉग पोस्ट के लिए सही इमेज का चयन करना जरुरत पड़े तो इमेज को एडिट करना
  • जरुरत पड़ने पर अपने ब्लॉग को डिजाईन करना 
  • साईट की स्पीड और अन्य समस्याओं को ठीक करना
  • अपने ब्लॉग के लिए फेसबुक और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर फैन पेज बनाना 
  • ब्लॉग पोस्ट को अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर करना 
  • अपने टॉप ब्लॉग पोस्ट्स को optimize करना 
  • कमेंट्स का जवाब देना और स्पैम कमेंट को हटाना 
  • दूसरों के ब्लॉग को पढना और वहाँ से सीखना 
  • गेस्ट पोस्टिंग करना यानि दूसरों के ब्लॉग पर पोस्ट लिखना 
  • अन्य ब्लोगर्स के साथ सम्बन्ध स्थापित करना और एक दुसरे को सपोर्ट करना 
  • विज्ञापन, sponsorships और अन्य तरीकों से अपने ब्लॉग को monetize करने के रास्ते ढूंढना
  • न्यूज़लेटर सेट करना 
  • ट्रैफिक और अन्य आंकड़ों का विश्लेषण करना 
  • अपने ऑडियंस के संपर्क में रहना 
  • अधिक से अधिक लोगों तक अपने ब्लॉग पहुँचाने के लिए योजनायें बनाना
जिस प्रकार से एक बिज़नस को आगे बढाने के लिए कई सारे काम करने पड़ते हैं ठीक उसी तरह एक ब्लॉग को सफल बनाने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है।

ब्लॉग कितने प्रकार के होते हैं? कौन से विषय पर ब्लॉग लिखा जाता है? इस दुनिया में लाखों ब्लोग्स हैं और ऐसे कई सारे विषय हैं जिनपर रोजाना कुछ न कुछ लिखा जा रहा है। लेकिन ब्लॉग शुरू करने के समय कई लोगों में इस बात को लेकर चिंता रहती है वे किस प्रकार का ब्लॉग बनायें और उस पर किस प्रकार के कंटेंट पोस्ट करें। सबसे पहले हमें एक विषय चुनना होता है जिसे niche भी कहा जाता है और फिर उससे सम्बंधित जानकारियाँ पोस्ट की जातीं हैं।

अगर चाहें तो हम एक से अधिक विषय पर भी लिख सकते हैं।

ब्लॉग कई प्रकार के होते हैं और इसे विषय के आधार पर हम कई सारे भागों में बाँट सकते हैं जैसे:
  • फैशन 
  • फ़ूड
  • फिटनेस
  • समाचार
  • लाइफ स्टाइल 
  • खेल-कूद
  • फिल्म
  • गेमिंग
  • फाइनेंस
  • राजनीती 
  • बिज़नस
  • पर्सनल 
  • ऑटोमोबाइल
  • पालतू जानवर 
यदि आप भी ब्लॉग बनाने की सोच रहें हैं तो हमारी यही सलाह होगी की आप अपने मनपसंद टॉपिक पर लिखना शुरू करें। आप चाहें तो एक से अधिक विषय पर लिख सकते हैं।

क्या ब्लॉग से पैसे कमा सकते हैं? हाँ! आप ब्लॉग्गिंग करके पैसे कमा सकते हैं और कई सारे लोग कमा भी रहे हैं।

लेकिन जिस प्रकार से एक बिज़नस से पैसे कमाने के लिए प्लानिंग और मेहनत की जरुरत होती है ठीक वैसे ही एक ब्लॉग से अच्छी कमाई करने के लिए भी योजना बनाई जाती है और लगातार मेहनत किया जाता है।

ब्लॉग को monetize करने के लिए कई सारे तरीके होते हैं जिनमे से सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले तरीके कुछ इस प्रकार हैं:
  • विज्ञापन
  • एफिलिएट मार्केटिंग
  • खुद का सामान या सर्विस बेचना 
  • डोनेशन से
  • खुद के बिज़नस का प्रचार करके
ब्लॉग्गिंग करके पैसे कमाने के लिए ब्लॉग पर अच्छी ट्रैफिक की जरुरत पड़ती है जिसके लिए एक ब्लॉगर को काफी मेहनत करनी पड़ती है।

कौन कर सकता है blogging? ब्लॉग्गिंग करने के लिए किसी विशेष योग्यता की जरुरत नही पड़ती है। इसे कोई भी किसी भी वर्ग का व्यक्ति समय निकाल कर कर सकता है जैसे:
  • स्कूल स्टूडेंट 
  • कॉलेज स्टूडेंट
  • गृहणी (हाउस वाइफ)
  • जॉब करने वाला व्यक्ति 
हर वह व्यक्ति ब्लोगिंग कर सकता है जिसके पास लिखने के लिए कुछ है। बस उसे इन्टरनेट और ब्लोगिंग के बारे में कुछ जानकारी होनी चाहिए।

ब्लॉग बनाने के लिए क्या चाहिए? शुरू करने से पहले आपको यह तय करना होगा की आप किस विषय पर आर्टिकल या कंटेंट बना सकते हैं। इसके बाद आपको एक प्लेटफार्म तैयार करना होगा जहाँ पर आप अपने आर्टिकल को पोस्ट कर सकें।

इस काम के लिए आपको दो चीजों की जरूरत पड़ेगी:
  1. डोमेन नेम
  2. वेब होस्टिंग 
डोमेन नेम का मतलब एक वेब एड्रेस जिसके जरिये आपके ब्लॉग को देखा जा सके जैसे आप इस ब्लॉग को webinhindi.com पर देख पा रहे हैं ठीक वैसे ही आपको एक एड्रेस खरीदना होगा जिसे ही डोमेन नाम कहा जाता है।

इसके लिए आपको 99 रूपये से 1500 रुपये लग सकते हैं। ऐसी कई सारी websites हैं जहाँ से आप डोमेन खरीद सकते हैं जैसे:
  • Godaddy
  • Bigrock
  • Namecheap
इसके बाद आपको वेब होस्टिंग की जरुरत पड़ेगी जिससे आपको इन्टरनेट पर एक स्पेस मिलेगा जहाँ आप अपने कंटेंट अपलोड कर पाएंगे। 

होस्टिंग के लिए आपको मासिक या सालाना कुछ पैसे चुकाने पड़ते हैं जो निर्भर करता है की आप कौनसा होस्टिंग प्रोवाइडर उपयोग करते हैं।

आपको इन्टरनेट पर कई सारे होस्टिंग प्रोवाइडर मिलेंगे जैसे:
  • Bluehost
  • Godaddy
  • Hostgator 
अगर आप होस्टिंग के लिए पैसे खर्च नही करना चाहते तो आप Blogger.com का उपयोग कर सकते हैं जो की गूगल का ही एक मुफ्त ब्लॉगिंग प्लेटफार्म है।



उम्मीद है आपको ब्लोगिंग के बारे में यह जानकारी पसंद आई होगी। यदि आप कोई सवाल पूछना चाहते हैं या सुझाव देना चाहते हैं तो नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरुर रखें।

Friday, 23 November 2018

डिजिटल मार्केटिंग क्या है? कितने प्रकार के होते हैं?

"डिजिटल मार्केटिंग" बीते कुछ सालों से यह शब्द बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है। मार्केटिंग का अर्थ तो सभी को पता है, अपने उत्पाद का प्रचार-प्रसार करना और ग्राहक तक अपनी पहुँच बनाना यह किसी भी मार्केटिंग का एक मुख्य उद्देश्य होता है।

लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता जा रहा है व्यापार करने के तौर-तरीके भी बदलते जा रहे हैं, अब लोग व्यापार करने के पारंपरिक तरीके से निकल कर डिजिटल मार्केटिंग की ओर बढ़ रहे हैं।

तो अब सवाल पैदा होता है की आखिर डिजिटल मार्केटिंग क्या है? क्या यह बिज़नस को आगे बढाने के लिए जरुरी है? इसके क्या-क्या फायदे हो सकते हैं? आज हमने यहाँ इन्हीं सवालों के जवाब आसान भाषा में देने की कोशिश की है।

Digital Marketing in Hindi


डिजिटल मार्केटिंग क्या है? आसान शब्दों में यदि हम इसे परिभाषित करें तो यह कुछ इस तरह हो सकता है: किसी प्रोडक्ट या सर्विस के प्रचार-प्रसार के लिए किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का उपयोग करना डिजिटल मार्केटिंग कहलाता है।

यहाँ पर ध्यान देने वाली बात यह है की कई लोग इन्टरनेट मार्केटिंग को ही डिजिटल मार्केटिंग समझ लेते हैं लेकिन सच तो यह है की डिजिटल मार्केटिंग अपने-आप में व्यापक है और इन्टरनेट मार्केटिंग उसका एक हिस्सा है।

जब हम रेडियो के ज़माने में थे तब से इसका उपयोग हो रहा है, आप रोड पर चलते हुए सड़क किनारे इलेक्ट्रॉनिक बोर्ड्स पर लगे विज्ञापन देखते हैं, यह भी डिजिटल मार्केटिंग का ही एक उदहारण है।

डिजिटल मार्केटिंग की शुरुआत कैसे हुई? जैसे की हमने ऊपर कहा की यह रेडियो के ज़माने से चलता आ रहा है और ठीक इसके बाद कंप्यूटर, इन्टरनेट और ईमेल के अविष्कार ने इसकी गति और बढ़ा दी, अब ईमेल के जरिये व्यक्तिगत रूप से लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सकती थी।

अब लोगों ने कंप्यूटर का जबरदस्त उपयोग करना शुरू कर दिया, उन्हें अपने ग्राहकों की जानकारी किसी रजिस्टर में लिखने के बजाय अब कंप्यूटर पर नोट करना ज्यादा आसान लगने लगा था।

इसी तरह जैसे-जैसे इलेक्ट्रोनिक डिवाइस का उपयोग मार्केटिंग में बढ़ता गया सन 1990 की दशक में इसे डिजिटल मार्केटिंग का नाम दिया गया।

सन 2000 के बाद इन्टरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ने लगी थी, लोग अब किसी सामान को खरीदने से पहले सर्च इंजन पर चीजें ढूँढने लगे थे ऐसे में हर बिज़नस को ऑनलाइन आना जरुरी था।

बाद में सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, लिंक्डइन, यूटूब और ट्विटर ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया और आज ये लोगों के निजी ज़िन्दगी का एक अहम् हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में अब सोशल मीडिया भी मार्केटिंग का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुका है।

उस पुराने समय से लेकर अब तक डिजिटल मार्केटिंग का ट्रेंड लगातार बढता ही गया है। नीचे हमने गूगल ट्रेंड का एक स्क्रीनशॉट दिया है जिसमे देखें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है की इस शब्द को सर्च करने की संख्या लगातार बढती ही जा रही है।

digital-marketing-trends

डिजिटल मार्केटिंग कैसे करें? ये कितने प्रकार के होते हैं? इसे हम मुख्य रूप से दो भाग में बाँट सकते हैं: ऑफलाइन मार्केटिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग। चलिए अब इन दोनों को विस्तार से समझते हैं:

ऑफलाइन डिजिटल मार्केटिंग: 
जी हाँ, ऑफलाइन मार्केटिंग भी डिजिटल मार्केटिंग का ही एक हिस्सा है। यह मार्केटिंग करने का एक ऐसा तरीका है जिसमे डिजिटल डिवाइस का उपयोग किया तो जाता है लेकिन यह जरुरी नही है की वह इन्टरनेट से जुड़ा हुआ हो।

इस श्रेणी में भी कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का उपयोग किया जा सकता है जैसे:
  • रेडियो
  • टीवी
  • मोबाइल
रेडियो: इस श्रेणी में यह सबसे पुराना तरीका है जिसमे लोगों तक अपनी आवाज़ और संगीत के माध्यम से रचनात्मक तरीके से अपनी बात पहुचाई जाती है। और कमाल की बात है की रेडियो की लोकप्रियता अभी भी कम नही हुई है और यही कारण है पिछले 10 सालों में रेडियो चैनल्स की आय लगातार बढ़ी है और 2018 में 470 मिलियन डॉलर हो गयी है।

टीवी: हम सभी बचपन से टीवी पर विज्ञापन देखते आ रहे हैं। इनमे से कुछ विज्ञापन जैसे एक्शन स्कूल शूज, झंडू बाम, वाशिंग पाउडर निरमा आदि तो जैसे हमारी यादों में बस गए हैं। लेकिन जब से यूटूब आया है लोग अब टीवी से दूर होते जा रहे हैं। टीवी पर विज्ञापन करने में कई सारी समस्याएं हैं, छोटे बिज़नस के लिए यह बहुत ही महंगा है और इसके अलावा इससे सटीक तरीके से टार्गेटिंग भी नही किया जा सकता जबकि यूटूब में यह बहुत ही आसान है।

मोबाइल: यहाँ पर हम एसएमएस मार्केटिंग की बात कर रहे हैं जिसका उपयोग अब स्मार्टफ़ोन के आने से कम हो गया है लेकिन इसका उपयोग आज भी किया जा सकता है।

ऑनलाइन डिजिटल मार्केटिंग:
इसे इन्टरनेट मार्केटिंग भी कहा जाता है, इसके नाम से ही पता चल रहा है की इस प्रकार के मार्केटिंग में ऐसे डिजिटल डिवाइस का उपयोग होता है जो की इन्टरनेट से जुड़े होते हैं जैसे: मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर आदि।

Online Digital Marketing Infographic in Hindi

ऑनलाइन मार्केटिंग भी कई प्रकार के होते हैं जिनमे से कुछ श्रेणियों के बारे में नीचे दिया गया है:
  • सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO)
  • सर्च इंजन मार्केटिंग (SEM)
  • पे-पर-क्लिक एडवरटाइजिंग (PPC)
  • सोशल मीडिया मार्केटिंग (SMM)
  • कंटेंट मार्केटिंग
  • ईमेल मार्केटिंग 
  • एफिलिएट मार्केटिंग
सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO):  यह एक ऐसा तरीका है जिससे किसी वेबसाइट की क्वालिटी को बढाया जाता है ताकि वह सर्च इंजन पर बेहतर स्थान प्राप्त कर सके।

कोई भी वेबसाइट या ब्लॉग तभी सफल होता है जब उस पर लोग विजिट करते हैं। अपनी वेबसाइट पर ट्रैफिक लेकर आना आसान काम नही होता, कई बार विज्ञापन के जरिये प्रमोशन करके ट्रैफिक लाया जाता है लेकिन यदि आप बिना विज्ञापन के अपनी वेबसाइट पर फ्री में ट्रैफिक यानि आर्गेनिक ट्रैफिक लाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको अपनी वेबसाइट को सर्च इंजन के लिए ऑप्टिमाइज़ करना होगा ताकि आपके वेबसाइट के कंटेंट सर्च इंजन पर दिखाई दे सकें और यह काम SEO द्वारा किया जाता है।

सर्च इंजन मार्केटिंग (SEM):  SEO से हम सर्च इंजन से मुफ्त में ट्रैफिक लेकर आते हैं वहीँ SEM एक पेड तरीका है जिसमे सर्च इंजन जैसे गूगल, बिंग आदि में विज्ञापन करके ट्रैफिक प्राप्त किया जाता है। इसमें विज्ञापनकर्ता को हर एक क्लिक के हिसाब से सर्च इंजन को पैसे देने पड़ते हैं।

पे-पर-क्लिक एडवरटाइजिंग (PPC): यह विज्ञापन का एक तरीका है जिसमे बैनर या टेक्स्ट के रूप में विज्ञापन दिखाया जाता और एडवरटाइजर को हर एक क्लिक पर निर्धारित मूल्य चुकाने होते हैं। 

इसका एक बेहतर उदाहरण आप गूगल पर देख सकते हैं: आप जब भी कुछ सर्च करते हैं तो रिजल्ट वाले पेज में सबसे ऊपर और साइड में कुछ विज्ञापन दिखाई देते हैं वे दरअसल PPC ads ही होते हैं। यह तरीका न सिर्फ सर्च इंजन में होता बल्कि कई सारी वेबसाइट पर PPC विज्ञापनों का उपयोग होता है।

PPC Ads example


सोशल मीडिया मार्केटिंग (SMM): 
सोशल मीडिया मार्केटिंग एक ऐसा तरीका है जिससे सोशल साइट्स जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इन्स्टाग्राम, यूटूब आदि का उपयोग कर किसी वेबसाइट, प्रोडक्ट या सर्विस को प्रमोट किया जाता है।

आजकल सोशल साइट्स का उपयोग हर कोई करता है बल्कि यह तो हमारी ज़िन्दगी का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। ऐसे में ये सोशल साइट्स मार्केटिंग के लिए एक बहुत ही बढ़िया प्लेटफार्म बन गये हैं। 

कंटेंट मार्केटिंग: यह मार्केटिंग एक नया तरीका है। इसमें हाई-क्वालिटी और रोचक कंटेंट बनायीं जाती है जिससे टार्गेट ऑडियंस को आकर्षित किया जा सके और उन्हें इंगेज रखा जा सके। यहाँ पर कंटेंट का मतलब डिजिटल कंटेंट से है यानि:
  • ब्लॉग पोस्ट
  • विडियो 
  • ई-बुक 
  • इन्फोग्रफिक
  • पॉडकास्ट आदि 
इसका मुख्य उद्देश्य किसी ब्रांड, प्रोडक्ट या वेबसाइट को प्रमोट कर ऑडियंस को ग्राहक बनाना होता है।

ईमेल मार्केटिंग: जी हाँ, ईमेल मार्केटिंग, यह आज भी काम करती है। इसमें कई लोगों को एक साथ प्रमोशनल ईमेल भेजे जाते हैं। इसकी खासियत यह है की यह आसान और सस्ता है। 

एफिलिएट मार्केटिंग: इसमें हम किसी दूसरे व्यक्ति या ब्रांड के प्रोडक्ट या सर्विस का प्रचार करते हैं और सेल्स मिलने पर कुछ कमीशन प्राप्त करते हैं।

ऑनलाइन डिजिटल मार्केटिंग के क्या-क्या फायदे हैं?
इसके कई सारे फायदे हैं जैसे:
  • यह किफायती है।
  • परिणाम तुरंत दिखाई देते हैं।
  • ब्रांड की विश्वसनीयता को बढाता है।
  • पूरी दुनिया में अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच बनायीं जा सकती है। 
  • ग्राहक से सलाह और प्रतिक्रिया लेना आसान है।
  • टारगेट करना आसान है - आप चाहें तो विज्ञापन सिर्फ उन्हीं लोगों को दिखा सकते हैं जो आपके संभावित ग्राहक हैं।
  • सुविधाजनक है।
सबसे अच्छी बात यह है की आप सारी चीजों का विश्लेषण बड़ी आसानी से कर सकते हैं: आप बड़ी आसानी से पता लगा सकते हैं की आपके ग्राहक कहाँ और किस देश से हैं, कितने लोगों ने आपके विज्ञापन को देखा, कितने लोगों ने क्लिक किया, उनकी उम्र क्या हो सकती है, वे कौन सी भाषा जानते हैं आदि। 

और ये सारी जानकारियां आपको अपने ऑडियंस या ग्राहक को समझने में मदद करेगी जिसके हिसाब से आप अपनी मार्केटिंग प्लान तैयार कर सकते हैं।

डिजिटल मार्केटिंग कैसे सीखें? डिजिटल मार्केटिंग कोई भी सीख सकता है, इसके लिए आवश्यक है मेहनत, लगन और सही दिशा में काम करने की।

अगर आप किसी संस्था से कोर्स करना चाहते हैं तो आपको इसके लिए आपको काफी अधिक पैसे खर्च करने पड़ेंगे इसलिए हमारी सलाह है की आप सारी चीजें ऑनलाइन ही सीखें।

इन्टरनेट पर जानकारियों की कोई कमी नही है। यहाँ आप ब्लॉग, वेबसाइट और यूटूब के माध्यम से लगभग सारी चीजें सीखी जा सकतीं हैं।


उम्मीद है की आपको डिजिटल मार्केटिंग के बारे में यह जानकारी पसंद आई होगी। यदि आप इससे जुड़े कोई सवाल पूछना चाहते हैं या कुछ सुझाव देना चाहते हैं तो नीचे कमेंट बॉक्स में राय जरुर रखें।